Monday, 9 February 2015

ارادہ



سب سے تکلیف دہ لمحہ وہ ہوتا ہے جب ہمارے خواب، ہماری خواہشیں ہمارے سامنے ہی دم توڑ دیتی ہیں اور ہم چاہ کر بھی کچھ نہیں کر پاتے.  ٹوٹے ہوئے خوابوں کی کرچیاں سمیٹتے سمیٹتے  ہاتھ اور نئے  خواب  دیکھتے دیکھتے آنکھ، دونوں ہی مجروح  ہو چکے ہیں. شکشتہ دل اور مجروح وجود کے ساتھ بھلا کوئی کتنا اور کب تک خواب دیکھے؟ مگر، یہ پاگل دل مجھے ہر پل ایک نئے محاز کی دہلیز پر لا پٹکتا ہے اور میں خود کو کسی ٹوٹے ہوئے پتّے کی مانند ہوا کے آگوش میں دے دیتا ہوں.

بکھرے ہوئے وجود کو یکجا کرنا شاید دنیا کا سب سے مشکل ترین کام ہے. آج مدّتوں بعد جب میں خود کو خود میں جوڑنے میں مشغول ہوں تو یہ جانا کہ میں نے اپنے وجود کے نہ جانے کتنے حصّے کھو دیے ہیں. جس جسکو میں نے اپنے وجود کا حصّہ بنایا تھا ان سبھی نے مجھے کسی ویران اور پرانی حویلی کی طرح کھنڈہر میں تبدیل کر دیا ہے. اب میں چاہ کر بھی خستہ حال تعلق کو مضبوط نہیں بنا سکتا. جس طرح کمزور ہو چکی اینٹوں پر لاکھ سیمنٹ کا گھول چڑھانے پر بھی وو مضبوط نہیں بن سکتی ٹھیک اسی طرح لاتعلق اور مطلبی رشتے کو محبّت اور لگاوٹ کی چاشنی میں ڈبو دینے پر بھی وہ کبھی آپکے وفادار نہیں ہو سکتے. اب کھو چکے وجود کے ٹکڑے کبھی  واپس تو آ نہیں سکتے پر ہاں، وو خالی حصّے گزرے ہوئے لمحوں کا ثبوت بن میرے وجود سے پیوند کی طرح چپکے ضرور رہین گے اور پیوند کے بکھیئے سے میرے وہ لمحات جھانکا کریں گے جو خوشی کے پل میں نے دوسروں کی زندگیوں میں بوۓ تھے، اور شاید وہ سارے پل میری کھڑکی کے سامنے والے پرانے پیپل پر نکل آۓ نئے کونپل کی طرح میری زندگی میں واپس آ جاییں اور میری زندگی پھر سے بہار کا نمونہ بن جائے.

میں نے اپپنے بکھرے وجود کو بارہا صرف اس لئے سینچا ہے کہ مجھے ایک دن فتح سے ہمکنار ہونا ہے. میں نے اپنے بکھرے وجود کو اسی پیپل کے تناور تنے کے حوالے کیا ہے. اس درخت نے میرے سارے سکھ دکھ ساجھا کیا ہے. آج جانے دل میں کیسی ہوک اٹھی تھی. میں صبح سے ہی کھڑکی پہ ہاتھ رکھے اسے تکا جا رہا ہوں.  ہاتھ میں کافی کا پیالہ ہے اور پیپل کی شاخوں کے پیچھے سے نئی صبح کا سورج نمودار ہو رہا ہے اور شاید مجھ سے یہی کہنا چاہ رہا ہے کہ آرزوئیں اور خواب کانچ کی طرح ہوتی ہیں جو ذرا سی ناکامی سے چٹک جاتی ہیں مگر حوصلے چٹان کی طرح ہوتی ہیں جو ہر ناکامی کے بعد اور مضبوط ہوتی جاتی ہے. دراصل ناکامی ہی کامیابی کی پہلی سیڑھی ہوتی ہے. مجھے دیکھو میں ہر شام ڈوب کے ہر صبح پھر سے نکلتا ہوں، مہینے کبھی ہار نہیں مانی اور تم اشرف المخلوقات ہوتے ہوئے بھی ابھی سے ہار بیٹھے؟ بس ایک بار مضبوط ارادے سے ڈٹ جاؤ تو فتح بس دو قدم پر تم سے ملاقات کر نے کو محو انتظار ہے.

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    - نیّر امام / ٠٩-٠٢-٢٠١٥ء. 

Sunday, 8 February 2015

ज़याक़ा

यूँ तो हर इतवार को 4 बजे AMU के अब्दुल्लाह हॉल के पुराने गेट और NSS ऑफ़िस के बीच की दूरी सिमट जाती थी. जाने उसकी ढूंढती नज़रों में ऐसा क्या था जो मैं हमेशा की तरह वहाँ वक़्त से पहले पहुँच जाता और उसका इंतज़ार करता रहता. जैसे ही हमारी नज़रें टकरातीं मैं साईकल को पेड़ के हवाले कर अपने बीच की दूरी को क़दमों ज़रब कर देता. GEC के लिटरेरी क्लब में हमारा रोज़ का मिलना था पर वहाँ लगे फ़व्वारे के पास के मुंडेर या पकड़ी के पेड़ की जड़ों पर बैठते वक़्त हमारी उँगलियों के आपस के लम्स या उनके मस्स हो जाने पर वो लज़्ज़त नहीं आ पाती थी जो आमिर निशाँ कि सँकरी सड़क और तंग गलियों से गुज़रते हुए हमारी उँगलियों को एक दुसरे से मुलाक़ात में हासिल होती थी.  

उसे रंग बिरंगे दुपट्टों का बहुत शौक़ था. हर इतवार वो नए डिज़ाइन और सफ़ेद दुपट्टे के साथ मिला करती. सड़क के किनारे रंगरेज़ (Garment Dyers) बड़े-बड़े पतीले में खौलते हुए पानी में तरह तरह के रंग घोलते और सफ़ेद दुपट्टों पर फ़रमाइश के हिसाब से रंग चुन देते. वो नया दुपट्टा और डिज़ाइन दुकानदार के हवाले कर पिछली बार रंगने को दिया दुपट्टा अपने हाथों पर फ़ैला देती. वो रंगों को जाँचती, परखती, दूकानदार से बहस करती और मैं दुपट्टे के नीचे उसके दाहिने हाथ की छोटी ऊँगली की नरमी, गर्मी और गोलईयों को जाँचता रहता. एक अजीब मीठा सा लज़्ज़त होता था उसकी उँगलियों के लम्स का शायद घी के साथ पिघले हुए गुड़ जैसा. रंगरेज़ की दुकानों से चन्द क़दम और आगे दोधपुर और मेडिकल कॉलेज जाने वाली सड़क के तिराहे पर गज़क की दूकान है, जहाँ हम अक्सर सर्दियों में जाया करते थे.

हमें बिछड़े एक अरसा हो गया है मगर उसकी उँगलियों के लम्स और लज़्ज़त अबतक बाक़ी हैं मुझमें. पिछली सर्दियों में उसने गज़क भेजने का वादा किया था, अब तक वो वादा वफ़ा की दहलीज़ तक नहीं पहुँचा. इस बार की सर्दी भी अब रुख़्सत होने होने को है, मगर शायद ही अब गज़क का पार्सल आए. लगता है हमारी दूरी ने उँगलियों के लम्स, रंगरेज़ के रंग और गज़क के मिठास को फीका कर दिया है. बिलकुल उसके होंटों के ज़ायक़े की तरह.

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- नैय्यर / 08-02-2015

Tuesday, 3 February 2015

शहर-दर-शहर

जाने क्यूँ कुछ शहरों की क़िस्मत ननिहाल और ददिहाल की मुहब्बत सी होती है ! कुछ शहरें मनुहार कर के रोक लेती हैं तो कुछ दुबारा आने तक को नहीं कहतीं. पर...कुछ शहर तो बिलकुल तुम्हारी अदाओं जैसे हैं. तुम्हारी बेरुख़ी जोधपुर की गार्मी की तरह है तो तुम्हारा ‘ईगो’ सियाचिन ग्लेशियर की तरह. तुम्हारी ख़ुशी दिल्ली के चाँदनी चौक की तरह है तो तुम्हारी ख़ूबसुरती कश्मीर की तरह, और...पता है तुम में सबसे अच्छा क्या है?

क्या?

आमेज़न नदी की तरह बल खाती तुम्हारी कमर

आमेज़न की तरह ? पर, उसमें तो अनाकोंडा रहता है !

तुम्हारा गुस्सा किसी अनाकोंडा से कम है क्या?

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- नैय्यर / 03-02-2015

Monday, 2 February 2015

याद

शाम सर्दियों की
अब्र आलूद मौसम
मोती फुहारों की
कॉफ़ी का कप
और तुम्हारी याद का धुआँ
इन सब में इक अजब सा तिलिस्म है
और तिलिस्म के उस पार

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घटती कॉफ़ी और तुम्हारी यादों का ज़ायक़ा
दोनों बिलकुल एक सा है
कड़वा बहुत कड़वा
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- नैय्यर / 22-01-2015

लप्रेक / चाँद

- तुमने आज का चाँद देखा?
- नहीं, क्यूँ कोई ख़ास बात? वैसे, इस अब्र-आलुद मौसम में भला चाँद दिखेगा भी?
- प्रिये ! खिड़की पर आओ और मेरी नज़र से देखो. कल शाम तुमने गीली मिट्टी पर अपने पैर के अंगुठे से जो चंद्रमा बनाया था न आज वो आसमान पर उग गया है.
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- नैय्यर / 23-01-2015

Thursday, 16 October 2014

तराना-ए-अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी / ترانہء علی گڑھ مسلم یونیورسٹی

ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ 
یہ میرا چمن ہے میرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں

सरशार-ए-निगाह-ए-नर्गिस हूँ, पाबस्ता-ए-गेसू-ए-सुम्बुल हूँ
سرشارِ نگاہِ نرگس ہوں، پابستہءِ گیسوءِ سمبل ہوں

हर आन यहाँ सोहबा-ए-कुहन, इक साग़र-ए-नव में ढलती है 
ہر آن یہاں صہپاےءِ کہن، اک ساغر نو میں ڈھلتی ہے

कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है 
کلیوں سے حسن ٹپکتا ہے، پھولوں سے جوانی ابلتي ہے

जो ताक़-ए-हरम में रौशन है वो शमा यहाँ भी जलती है 
جو طاقِ حرم میں روشن ہے وہ شمع یہاں بھی جلتی ہے

इस दश्त के गोशे-गोशे से इक जुए हयात उबलती है 
اس دشت کے گوشے - گوشے سے اک جوئے حیات ابلتي ہے

इस्लाम के इस बुत खाने में असनाम भी हैं और आज़र भी 
اسلام کے اس بت خانے میں اصنام بھی ہیں اور آذر بھی

तहज़ीब के इस मयख़ाने में शमशीर भी है और साग़र भी 
تہذیب کے اس ميخانے میں شمشير بھی ہے اور ساغر بھی

याँ हुस्न की बर्क़ चमकती है, याँ नूर की बारिश होती है 
ياں حسن کی برق چمکتی ہے، ياں نور کی بارش ہوتی ہے

हर आह यहाँ इक नग़मा है हर अश्क यहाँ इक मोती है 
ہر آہ یہاں اک نغمہ ہے ہر اشک یہاں اک موتی ہے

हर शाम है शाम-ए-मिस्र यहाँ, हर शब है शब-ए-शीराज़ यहाँ 
ہر شام ہے شامِ مصر یہاں، ہر شب ہے شبِ شيراز یہاں

है सारे जहाँ का सोज़ यहाँ और सारे जहाँ का साज़ यहाँ 
ہے سارے جہاں کا سوز یہاں اور سارے جہاں کا ساز یہاں

ये दश्त-ए-जुनूँ दीवानों का, ये बज़्म-ए-वफ़ा परवानों की 
یہ دشتِ جنوں دیوانوں کا، یہ بزمِ وفا پروانوں کی

ये शहर-ए-तरब रूमानों का, ये ख़ुल्द-ए-बरीं अरमानों की 
یہ شہرِ طرب رومانوں کا، یہ خلدِ بریيں ارمانوں کی

फितरत ने सिखाई है हमको, उफ्ताद यहाँ परवाज़ यहाँ
فطرت نے سکھائی ہے ہم کو، افتاد یہاں پرواز یہاں

गाये हैं वफा के गीत यहाँ, छेड़ा है जुनूँ का साज़ यहाँ 
گائے ہیں وفا کے گیت یہاں، چھیڑا ہے جنوں کا ساز یہاں

इस फर्श से हमने उड़-उड़ कर अफलाक के तारे तोड़े हैं 
اس فرش سے ہم نے اڑ - اڑ کر افلاک کے تارے توڑے ہیں

नाहिद से की है सरगोशी, परवीन से रिश्ते जोड़े हैं 
ناہید سے کی ہے سرگوشي، پروین سے رشتے جوڑے ہیں

इस बज़्म में तेगें खींची हैं, इस बज़्म में साग़र तोड़े हैं 
اس بزم میں تیغیں کھینچی ہیں اس بزم میں ساغر توڑے ہیں

इस बज़्म में आँख बिछाई है इज बज़्म में दिल तक जोड़े हैं 
اس بزم میں آنکھ بچھائی ہے اس بزم میں دل تک جوڑے ہیں

इस बज़्म में नेज़े फेंके हैं, इस बज़्म में खंजर चूमे हैं 
اس بزم میں نیزے پھینکے ہیں، اس بزم میں خنجر چومے ہیں

इस बज़्म में गिर कर तडपे हैं, इस बज़्म में पी कर झूमे हैं 
اس بزم میں گر کر تڑپے ہیں، اس بزم میں پی کر جھومے ہیں

आ-आ के हजारों बार यहाँ ख़ुद आग भी हमने लगाई है 
آ - آ کے ہزاروں بار یہاں خود آگ بھی ہم نے لگائی ہے

फिर सारे जहाँ ने देखा है ये आग हमने बुझाई है 
پھر سارے جہاں نے دیکھا ہے یہ آگ ہم نے بجھائی ہے

याँ हमने कमंदें डाली हैं, याँ हमने सलाखुं मारे हैं 
ياں ہم نے كمندیں ڈالی ہیں، ياں ہم نے سلاخوں مارے ہیں

याँ हमने क़बायें नोची हैं, याँ हमने ताज उतारे हैं 
ياں ہم نے قبایںء نوچي ہیں، ياں ہم نے تاج اتارے ہیں

हर आह है ख़ुद तासीर यहाँ, हर ख़्वाब है ख़ुद ताबीर यहाँ 
ہر آہ ہے خود تاثیر یہاں، ہر خواب ہے خود تعبیر یہاں

तदबीर के पाय-संगीं पर झुक जाती हैं तक़दीर यहाँ 
تدبیر کے پائے سنگین پر جھک جاتی ہیں تقدیر یہاں

ज़र्रात का बोसा लेने को सौ बार झुका आकाश यहाँ 
ذرّات کا بوسہ لینے کو سو بار جھکا آکاش یہاں 

खुद आँख से हमने देखी है बातिल की शिकश्त-ए-फाश यहाँ 
خود آنکھ سے ہم نے دیکھی ہے باطل کی شكشتِ فاش یہاں

इस गुलकदा-ए-पारीना में फिर आग भड़कने वाली है 
اس گلكدہء پارينہ میں پھر آگ بھڑکنے والی ہے

फिर अब्र गरजने वाले हैं, फिर बर्क़ कड़कने वाली है 
پھر ابر گرجنے والے ہیں، پھر برق کڑکنے والی ہے

जो अब्र यहाँ से उठेगा वो सारे जहाँ पर बरसेगा 
جو ابر یہاں سے اٹھے گا، وہ سارے جہاں پر برسے گا

हर जुए रवाँ पर बरसेगा, हर कोहे गिराँ पर बरसेगा 
ہر جوئے رواں پر برسے گا، ہر کوہ گراں پر برسے گا

हर सर-व-समन पर बरसेगा, हर दश्त-व-दमन पर बरसेगा 
ہر سر وسمن پر برسے گا، ہر دشت و دمن پر برسے گا

ख़ुद अपने चमन पर बरसेगा, गैरों के चमन पर बरसेगा 
خود اپنے چمن پر برسے گا، غیروں کے چمن پر برسے گا

हर शहर-ए-तरब पर गरजेगा, हर क़स्र-ए-तरब पर कड़केगा 
ہر شہرِ طرب پر گرجے گا، ہر قصرِ طرب پر كڑكےگا

ये अब्र हमेशा बरसा है, ये अब्र हमेशा बरसेगा 
یہ ابر ہمیشہ برسا ہے، یہ ابر ہمیشہ برسے

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मजाज़ / مجاز 
1936
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© Aligarh Muslim University (http://www.amu.ac.in/)
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When Dr. Zakir Husaain was the Vice Chancellor of AMU he removed some verses from the original Poem of Majaz and thus the ‘Tarana-E-Aligarh’ came in existence. Enjoy the melody of the AMU’s Tarana http://www.youtube.com/watch?v=VIos_YTJ3po
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Research and Compilation by - https://www.facebook.com/naiyarimam.siddiqui

Saturday, 4 October 2014

इक मुलाक़ात ‘रावण’ से

सुबह ही सुबह किसी ने मुझे झंझोड़ के उठाया – अमाँ यार उठो, नमाज़ नहीं पढ़नी क्या तुम्हें? मैं जल्दी से उठा तो देखा रावण भाई मेरे पैताने बैठे हुए थे. मैं घबरा के पूछा, आज इधर कैसे और वो भी इतनी सुबह? पहले तुम नमाज़ पढ़ आओ, फिर बात करते हैं. आँख मसलते हुए मैंने घड़ी देखी, सुबह के 04: 30 हो रहे थे. थोड़ी देर में अज़ान होने वाली थी. मैंने बिस्तर के उठ के मुहँ धोया, वज़ू किया और बाद नमाज़ क़ुरान की तिलावत की और वापस आ के पूछा, ‘हाँ ! अब कहों, आज कैसे याद किया?’

‘‘क्या क्या सितम उसने किये जान पे मेरी, क्या बात है वो फिर भी सितमगर नहीं लगता’’ – दीवार से टेक लगाए मेरे सवाल के जवाब में उसने शे’र सुनाया. मैंने कहा क्या बात है आज बहुत शायराना मूड में हो. इधर मैं सुलगा पड़ा हूँ और तुम्हें मस्ती सूझी पड़ी है, उसने गुस्से से अपना नाक फुलाया. अच्छा चलो अब मस्ती नहीं, सीरियसली  बताओ क्या बात है जो सुलगे पड़े हो?

यार, ये बताओ कि मैंने ऐसा क्या किया है जो हर साल जलाया जाता हूँ और राम ने ऐसा क्या किया है जो सदियों से पूजा होती आ रही है उसकी? देख भाई, ये ‘इंटर रिलिजन’ सवाल मत पूछ, बहुत लफड़ा होता है इधर मेरे देश में दुसरे के धर्म के बारे में बोलने पर. देख, तू कन्नी मत काट, सीधे-सीधे जवाब बता. भाई, पहले तू अपना पक्ष, अपनी दलील रख तभी मैं निष्पक्ष फ़ैसला कर पाउँगा.

मतलब तू चाहता है आज मैं फिर से एक बार इतिहास, भूगोल उलट-पुलट करूं. मेरे दस सिर हैं फिर भी मेरी याद्दाश्त थोड़ी कमज़ोर है. जितना याद है उसके मुताबिक़ तुम्हारा आज के दक्षिण भारत का कुछ भाग भी तब मेरे राज्य के अधीन था. राम अपनी पत्नी एवं भाई लक्ष्मण के साथ वनवास काट रहे थे और उस वक़्त मेरे राज्य के जंगल में विचरण कर रहे थे. ‘फेयर एंड लवली’ लगाने वाले देश के दो जवान युवक देख कर वो उनपर मोहित हो गयी, हालाँकि उनका रंग हमारे देश के जवानों से थोड़ा सा ही हल्का रहा होगा, पर वो बात तो सुना होगा न कि दिल लगा दीवार से तो.... जिस देश में कृष्ण और राधा नें ‘अपने अपने’ ‘’साथी’’ को छोड़ ‘लिमिटलेस’ प्यार किया उसी देश के युवकों नें मेरी बहन के प्रणय निवेदन का मज़ाक़ बनाया और लगे दोल्हा-पाती खेलने. एक कहता दुसरे से कर लो, दूसरा कहता पहले से कर लो. कृष्ण ने तो कई हज़ार पटरानियाँ रखी थी, अगर राम और लक्ष्मण एक पत्नी ‘ज़्यादा’ रख लेते तो मेरे जंगल में कुटिया रखने के लिए ज़मीन थोड़े न कम पड़ जाती? मेरी बहन राजकुमारी थी फिर भी ‘’लीगली’’ ‘दूसरी पत्नी’ बनने को तैयार थी लेकिन उन दोनों को दोल्हा-पाती खेलते खेलते जाने कब और क्यूँ गुस्सा आया कि एक ने मेरी बहन के नाक-काट लिए. मेरी बहन रोते क़िले में आई और सारा माजरा कह सुनाया. तुम बताओ सब जान के कौन सा भाई होगा जिसका खून नहीं खोलेगा? माना कि तब चुनाव नहीं होते थे लेकिन रजा को भी अपना दबदबा बना के रखना पड़ता है, वरना मेरा भाई कब तख़्ता पलट देता, क्या भरोसा? तुम्हें तो पता ही है कि गुस्से में मेरा ख़ुद पे कंट्रोल नहीं रहता, दस दिमाग़ की बात कैसे समझता. न आगा देखा ना पीछा. राम और लक्ष्मण को छकाने के बाद मैंने सीता का हरण कर लिया. उन्हें अशोक वाटिका में नेचुरल ऐ.सी में रखा, कभी हाथ नहीं लगाया. राम वनवास समाप्ति के बाद राजगद्दी पर बैठते, मैं भी रजा था, हमारी भाषा अलग थी, उन्हें मामला बहुभाषीय के ज़रिये सुलझाना चाहिए था. मैंने सीता का हरण सिर्फ़ इसलिए किया था कि पता चले कि स्त्री कि इज़्ज़त कितनी नाज़ुक होती है, ये खेलने कि नहीं सम्मान कि हक़दार होती है लेकिन वो बातचीत करने नहीं आए. हनुमान के ज़रिये मेरे राज्य में ‘घुसपैठ’ करा दिया. मेरे जंगल से बिना मेरी इजाज़त पेड़ काटे, पत्थर उखाड़े, मिटटी काटी और पुल बनाया. जिसका पर्यवारनणीय ख़ामियाज़ा हमने पिछले दसक में सुनामी के रूप में भुगता. पूल बना कर हनुमान मेरे महल तक आये लेकिन संवाद करने नहीं, शाजिश करने. सीता को महल से भगाने के लिए उसने शाजिश रचा और जब हमारे सैनिकों ने रोकना चाहा तो मेरी सोने की लंका को कोयले की लंका में बदल दिया. तुम्हारे सोने जैसी चिड़िया देश को अंग्रेज़ों ने लूटा तो आज तक तुम लोग उन्हें गाली देते हो, मेरी लंका हनुमान ने फूंक दी फिर भी हमारे वंशजों ने कभी किसी बानर को गाली नहीं दिया ना ही किसी भारतीय को क्यूँकी हनुमान का नेतृतव तो भारतवंशी राम ही कर रहे थे. उल्टा हमने अपने जंगलों में बानरों को रहने का ‘परमिट’ जारी किया. राम ने मेरे साथ विश्वासघात किया, मेरे भाई-भतीजे, और बेटे को वारगालाया, ‘सत्ता’ में ‘गठबंधन’ का लालच दे कर मेरे ख़िलाफ़ युद्ध के लिए उकसाया और मेरा ‘वध’ कर दिया. युद्ध में वो सब भी मारे गए लेकिन छल-कपट से जीता गया युद्ध राम को ‘भगवान’ बना गया और मुझे ‘दानव’. (हालाँकि भारत में भगवान का कॉपीराईट ‘ब्राह्मण खानदान’ के पास है फिर क्षत्रिय खानदान में भगवान कैसे पैदा हो गए?) युद्ध उपरान्त भारत लौटते समय वो मेरा पुष्पक विमान तक उठा ले गए. जिस सीता के लिए मेरी सवर्ण नगरी जला दी, मेरा खानदान बर्बाद कर दिया उसी सीता को गर्भ की हालत में त्याग का दिया राम ने और ‘मर्यादा पुरषोत्तम’ का ‘मैडल’ जीत लिया. जो हनुमान अपना सीना चीर के ये दिखा सकता है कि मेरे सीने में राम, सीता और लक्ष्मण हैं वो सीता के अग्नि परीक्षा के वक़्त चुप क्यूँ रहा? सीता कि शुद्धता की गवाही क्यूँ नहीं दी उसने? जिसने सीता के धोका किया उसी का मंदिर सबसे ज़्यादा है तुम्हारे देश में, जिसने सीता कि अग्नि परीक्षा ली उसके मंदिर के नाम पे ‘सत्ता का ख़ूनी खेल’ खेला जाता है लेकिन जिसने सारा सितम हँस के सहा उसके कितने मंदिर है तुम्हारे यहाँ? मैंने सारी बेईमानियाँ बर्दाश्त इसलिए की के मेरे दहन के बहाने ही सही सीता को याद तो किया जाएगा, लेकिन सीता ‘बैकफूट’ में चली गयी और राम ‘फ्रंट फूट’ में आ गए. ये सारा सितम भी मैंने गवारा किया लेकिन कल शाम सुभाष मैदान में मैं अपने दहन से पहले ही सुलग चूका था. मैं लाख बुरा सही, लेकिन मैंने मजलूमों का खून नहीं बहाया, गर्भवती महिलाओं का गर्भ चीर के उनके बच्चों को तलवार पे ले के नहीं घूमा, मैंने बलात्कार नहीं किया, मैंने बच्चों को नहीं मारा, इंसानों को ज़िन्दा नहीं जलाया, किसी कि जासूसी नहीं की, अपनी पत्नी को पत्नी सुख से वंचित नहीं किया, उसे परित्यक्त नहीं किया लेकिन ये सभी कर्म करने वाला और कराने वाले इंसान ने जब मेरे दहन के लिए धनुष-बाण उठाया तो ऐसा लगा कि आज रावण ज़िन्दा हो गया, राम मर गया.

मैंने अपनी सदियों लम्बी कहानी ‘कॉम्प्रेस’ कर के तुम्हें सुना दी, अब सुनाओ अपना निष्पक्ष फ़ैसला. भाई रावण मेरे हिसाब से तुम ही सही हो, लेकिन मेरे फ़ैसले से मेरे देश में बवाल हो जाएगा, लोग मुझे ही ‘आतंकवादी’ घोषित कर देंगे इसलिए मैं अपना फ़ैसला सुरक्षित रखता हूँ और ये वादा करता हूँ कि आज से किसी को ‘रावण दहन’ की बधाई नहीं दूँगा. तुम जबतक जियोगे राम को जीना पड़ेगा, यही तुम्हारी जीत है.


~ © नैय्यर / 04/10/2014