Friday, 8 April 2016

AMU का माइनॉरिटी स्टेटस : सरकार की आँख की किरकिरी क्यूँ?




जब सारे देश द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अपने ज़ख्म गिनने में लगे थे तब हैदराबाद के सातवें और आख़िरी निज़ाम नवाब मीर उस्मान अली ख़ान हैदराबाद में 'जामिया उस्मानिया' यानी उस्मानिया यूनिवर्सिटी की बुनियाद रख रहे थे। ब्रिटिश कालीन भारत की ये पहली यूनिवर्सिटी थी जिसमें विज्ञान, कला, साहित्य, अभियांत्रिकी, चिकित्सा, कृषि इत्यादि को पढ़ाने का माध्यम 'उर्दू' था। देश के बँटवारे के वक़्त हैदराबाद रियासत ने अलग रहने का फ़ैसला किया पर इसे सितम्बर 1948 में 'ऑपरेशन पोलो' के ज़रिये दमन कर भारतीय संघ में शामिल कर लिया गया। निज़ाम के शासन के ख़ात्मे के साथ ही 'उर्दू' में शिक्षा देने के प्रावधान के साथ ही इस विश्वविद्यालय का 'Muslim Character' समाप्त कर दिया गया जो भारतीय संविधान के आर्टिकल 30 की खुली अवमानना है।
जामिया के छात्रों (वर्तमान और पूर्व) और शिक्षक संगठन द्वारा PM नरेंद्र मोदी के दीक्षांत समारोह में आने का विरोध करने की वजह से JMI के साथ भी राजनीति हुई और मामला गरमाया कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया Minority Institution नहीं है, फ़िलहाल जामिया के माइनॉरिटी शिक्षण संस्थान होने का मामला पेंडुलम की तरह है। जामिया की पहचान ही माइनॉरिटी शिक्षण संस्थान के रूप में है और ये जामिया की पहचान और उसका वाजिब हक़ है। तलवार तो लटकी है AMU पर।
देश के बँटवारे के बाद सिखों के खालसा कॉलेज के पाकिस्तान (लहौर) में चले जाने के बाद ये माँग भी उठी थी कि खालसा कॉलेज के बदले AMU सिखों को सौंप दिया जाए। इस माँग के उठने के बाद मौलाना आज़ाद और डॉ. ज़ाकिर हुसैन के हस्तक्षेप के बाद नेहरू जी ने मामले को संभाला और AMU की इंफ़रादियत को बरक़रार रखा। अदालतों में बैठे वो वकील जिन्होंने AMU को 'Minority Status' देने से इंकार किया है उन्हें AMU के इतिहास को फिर से पढ़ लेना चाहिए।
1857 के ग़दर में अंग्रेज़ों द्वारा मुसलमानों के बेहिसाब क़त्ल-व-ग़ारत के बाद सर सैय्यद अहमद ख़ान ने मुसलमानों में तालीमी बेदारी को पैदा करने के लिए 1858 में मुरादाबाद में और 1863 में ग़ाज़ीपुर में स्कूल की बुनियाद रखी। मुसलमानों में साइंटिफ़िक रुझान को पैदा करने और उसे बढ़ाने के लिए उन्होंने 1864 में साइंटिफ़िक सोसाइटी की बुनियाद राखी। इसी सिलसिले को बढ़ाते हुए सर सैय्यद अहमद ख़ान ने अलीगढ़ में मदरसतुल ओलूम मुसलमान-ए-हिन्द की बुनियाद रखी जिसे 1877 से मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाने जाने लगा। शुरु में ये कॉलेज कलकत्ता विश्वविद्यालय से एफ़िलिएटेड था जो आगे चलकर 1885 में इलाहबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हो गया। महिलाओं के लिए SNDT विश्वविद्यालय खुलने के दशक भर बाद ही 1902 में MAOC में Women's College' की बुनियाद पड़ी जो बाद में मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति बनी और 1920 आते आते ब्रिटिश हुक़ूमत ने इसे 'Central University' का दर्जा दिया और इस तरह मदरसतुल ओलूम AMU के नाम से देश-दुनिया में मशहूर हुआ। AMU को हिन्दुस्तान की पहली Fully Residential University होने का ऐजाज़ हासिल है और इसके लिए चंदे और ज़मीनें देने वालों में 99% मुसलमान हैं। सर सैय्यद के कुछ हिन्दू दोस्तों ने चंदे और ज़मीनें दी हैं मगर मदरसा से यूनिवर्सिटी बनाने तक इसकी आबयारी और परवरिश मुसलमानों ने ही की है और कोर्ट में इंसाफ़ देने का हलफ़ लेकर बैठे मनसफ़ जब ये कहते हैं कि AMU is not an Minority Institution तो आईन की आर्टिकल 30 वहीँ कटघरे में ही बेमौत मर जाती है।
UPA के तत्कालिक अल्पसंख्यक मंत्री (राज्य प्रभार) सलमान ख़ुर्शीद ने वक़्फ़ बोर्ड की ज़मीन पर बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी, लखनऊ (यू.पी) और इंदिरा गाँधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी, अमरकंटक (एम. पी) की तर्ज़ पर तीन नए केंद्रीय अल्पसंख्यक विश्विद्यालय खोलने की बात की थी। इसके तहत मैसूर (कर्णाटक) में टीपू सुल्तान यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, किशनगंज (बिहार) में रफ़ी अहमद क़िदवई यूनिवर्सिटी ऑफ़ हेल्थ साइंसेज़ और अजमेर (राजस्थान) में ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ यूनिवर्सिटी खोलने की योजना थी। शेर-ए-मैसूर टीपू सुल्तान की जयंती पर विश्व हिन्दू परिषद और बजरंज दल के उपद्रव और केंद्र सरकार की चुप्पी ने ये साबित कर दिया है कि मैसूर में प्रस्तावित टीपू सुल्तान यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी खोलने में मौजूदा केंद्र सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है इसलिए भाजपा की 'सिस्टर आर्गेनाईज़ेशंस' द्वारा टीपू सुल्तान को देशद्रोही, हिन्दू विरोधी और लूटेरा साबित करने के लिए किये उपद्रव सुनियोजित थे। संघ समर्थित वर्त्तमान सरकार का अल्पसंख्यंकों के प्रति जो रवैय्या और इतिहास है उसे देखते हुए लगता है कि केंद्र सरकार AMU के बाक़ी बचे दो सेंटर्स के अलावा तीन प्रस्तावित अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय खोलने के लिए शायद ही कभी पहल करे।
साथ ही AMU के तीनों सेंटर्स मल्लापुरम (केरल), मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल) और किशनगंज (बिहार) को पूर्ण रूप से अल्पसंख्यक विश्विद्यालय का दर्जा देने की भी कोशिश हुई थी जिसे AMU ने मानने से इंकार कर दिया था क्योंकि AMU को ये सेंटर्स 'सच्चर कमिटी' की रिपोर्ट के आधार पर मिले हैं हालाँकि अबतक महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश ने AMU के लिए ज़मीन मुहैय्या नहीं कराया है। पिछले दिनों MHRD मंत्री स्मृति ज़ुबिन ईरानी ने साफ़ कर दिया था कि वित्तीय कमी के चलते AMU के पुने (महाराष्ट्र) और भोपाल (मध्यप्रदेश) कैंपस नहीं खोले जा सकते।
सनद रहे कि UGC एक्ट 1956 के अनुसार ही देश के विश्विद्यालयों को सेंट्रल, डीम्ड और स्टेट यूनिवर्सिटी का दर्जा मिलता रहा है। AMU को 1920 में ब्रिटिश हुक़ूमत ने सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया था जिसे पहली बार 1968 में तत्कालिक सरकार ने ख़त्म किया था। 1981 में इंदिरा गाँधी की सरकार ने वापस AMU को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया था जिसे एक बार फिर 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ये कहते हुए ख़त्म कर दिया कि 'AMU was set up by an act of parliament not by a minority community.' इतिहास गवाह है कि AMU के संस्थापक सर सैय्यद अहमद ख़ान हैं न कि इसे पार्लियामेंट ने  संविधान के एक्ट के अनुसार स्थापित किया है, ब्रिटिश पार्लियामेंट ने इसे सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जिसे भारतीय क़ानून ने, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, भी माना और सेंट्रल यूनिवर्सिटी होने की वजह से यूनिवर्सिटी का ख़र्च सरकार उठाती है। सिर्फ़ यूनिवर्सिटी का वित्तीय ख़र्च उठा भर लेने से AMU सरकार द्वारा, संविधान द्वारा स्थापित यूनिवर्सिटी हो गयी क्या? 2006 के बाद से AMU के Minority Status का मामला सुप्रीम कोर्ट में था और एक दसक बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी वही कहा जो 2006 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था। दरअसल केंद्र सरकार AMU को उसका हक़ देना ही नहीं चाहती, चाहे वो UPA हो या NDA, अगर UPA सरकार अल्पसंख्यकों की हितैषी है तो दस साल तक सत्ता में बने रहने के दौरान उसने AMU के अल्पसंख्यक दर्जे के हक़ को बहाल क्यूँ नहीं किया? NDA तो ख़ैर अल्पसंख्यक विरोधी है ही।
AMU को लेकर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ज़ुबिन ईरानी की समझ सबसे निम्न स्तर पर है। 1920 में ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा 'सेंट्रल यूनिवर्सिटी' घोषित किये गए संस्थान को ये 'डीम्ड यूनिवर्सिटी' के नियम से हाँकना चाहती हैं। ईरानी जी के संघी नियम के हिसाब से AMU के 'ऑफ़-कैंपस' अवैध हैं जब्कि ये कैंपस 'सच्चर कमिटी' की शिफ़ारिशों के बाद खोले गए हैं और अबतक 5 कैंपस में से सिर्फ़ 3 कैंपस (केरल के मल्लापुरम, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और बिहार के किशनगंज में) ही खोले जा सके है और बाक़ी 2 कैंपस (मध्यप्रदेश के भोपाल और महाराष्ट्र के पुणे) के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। AMU के पुराने और नये किसी भी ऑफ़-कैंपस के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। पिछले दिनों केरल के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में गए डेलिगेशन के सदस्य और AMU के कुलपति को ईरानी जी ने अपमानित किया और मुख्यमंत्री को ये तक कह दिया कि मल्लापुरम कैंपस को दी गयी अपनी ज़मीन वापस ले लीजिये क्यूँकि सरकार के पास AMU के 'अवैध कैंपस' के लिए पैसे नहीं हैं। और अब ख़बर आ रही है कि कुलपति लेफ़्टिनेंट (रिटायर्ड) ज़मीरुद्दीन शाह को हटाने का ब्लू प्रिंट लगभग तैयार है।
BHU का भी एक ऑफ़-कैंपस उत्तरप्रदेश के मिर्ज़ापुर में है। हरियाणा के सोनीपत में IIT Delhi का एक ऑफ़-कैंपस है तो IIT Roorkee के दो ऑफ़-कैंपस सहारनपुर और ग्रेटर नोएडा में हैं लेकिन 'अवैध' सिर्फ़ AMU के ऑफ़-कैंपस ही हैं बाक़ी संस्थानों के नहीं। दरअसल कुछ महीने पहले संसद में ईरानी जी ने कहा था कि डीम्ड यूनिवर्सिटी के वो सभी ऑफ़-कैंपस अवैध हैं जो मंत्रालय के बिना अनुमति और NOC के खोले गए हैं और इस लिस्ट में BIT, TISS, ISM और कई अन्य शिक्षण संस्थान के कैंपस शामिल हैं और यही नियम ईरानी जी AMU पर थोपना चाहती हैं। ये हमारा दुर्भाग्य है कि जिसे डीम्ड और सेंट्रल यूनिवर्सिटी में फ़र्क़ नहीं पता उसे हमारे सर पर HRD मंत्रालाय का मुखिया बना कर थोप दिया गया है।
एक दो ज़ख्म नहीं, जिस्म है सारा छलनी
दर्द बेचारा परीशाँ है, कहाँ से उट्ठे??

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-    नैय्यर इमाम सिद्दीक़ी

Wednesday, 23 March 2016

Last Letter of Bhagat Singh from Lahore Central Jail (in Urdu)


मुसलमानों ! खबरदार...तुमने कमलेश तिवारी को ब्रांड बना दिया


एक यहूदी महिला हज़रत मोहम्मद (स०) से बस इस बात से थी ख़फ़ा थी थी कि उन्होंने बुतपरस्ती के बदले एक ईश्वर की इबादत पर ज़ोर दिया. उसने इसे अपने ख़ुदा (बुत) का अपमान समझा और हज़रत मोहम्मद (स०) से बदला लेने का सोचा. वो एक ईश्वरवाद का सन्देश देने के लिए रोज़ उसकी गली से गुज़रते थे. एक दिन उस महिला ने सोचा कि अगर उनपर कचरा फेंक दिया जाय तो वो गुस्सा होंगे, चीखेंगे-चिल्लायेंगे तो गली में रहने वाले उनका मज़ाक़ बनायेंगे और उनपे हसेंगे और वो सब मेरी तारीफ़ करेंगे क्यूंकि किसी ने उन्हें कभी गुस्सा होते नहीं देखा था. एक दिन आप (स०) उसकी गली से गुज़र रहे थे तभी उस महिला ने आप पर छत से कचरा फेंक दिया, आप ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराते ही आगे बढ़ गए. महिला की चाल कामयाब नहीं हुई तो उसने ये रोज़ का मामूल बना लिया कि किसी दिन तो वो गुस्सा होंगे और इस नीयत से वो हर रोज़ उनपर कचरा फेंकती और महिला हज़रत मोहम्मद (स०) बिना कुछ कहे कचरा साफ़ करते और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते. 
 
एक दिन आप रोज़ाना की तरह गली से गुज़र रहे थे, उस दिन आप पर छत से कचरा नहीं गिरा तो आप हैरान हुए कि क्या बात है कि आज उस महिला ने मुझ पर कचरा नहीं फेंका? आप ने उसका दरवाज़ा खटखटाया तो अन्दर से एक कमज़ोर आवाज़ आई, कौन? आपने कहा मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह., मैं अन्दर आ सकता हूँ? उस यहूदी महिला ने समझा कि आज मैं कमज़ोर हूँ, मुक़ाबला नहीं कर सकती इसलिए ये बदला लेने आये हैं. लेकिन अन्दर आने का आग्रह इतनी विनम्रता से किया गया था कि वो महिला इनकार नहीं कर सकी और उसने अन्दर आने की इजाज़त दे दी. 

अन्दर जाने पर आपने उस महिला से कहा कि आज तुमने मुझपर छत से कचरा नहीं फेंका तो मैं चिंतित हुआ कि कहीं तुम बीमार तो नहीं? उसे बीमार देख आपने कहा कि किसी भी तरह की मदद चाहिए तो मुझ से कहो. हज़रत मोहम्मद (स०) के स्नेही और नर्म लहजे ने उसका सारा डर दूर कर दिया. उसने आपसे पीने के लिए पानी माँगा. आपने उसे एक बर्तन में पानी दिया जिस से उसने अपनी प्यास बुझाई और अपनी पिछले बुरे बर्ताव के लिए माफ़ी मांगी. आपने उसे फ़ौरन माफ़ कर दिया और उसके जल्द स्वस्थ होने की दुआ की और वो जबतक स्वस्थ नहीं हो गयी आप उसकी तीमारदारी को उसके घर जाते रहे, यहाँ तक आप उसके घर को साफ़ करते, उसे खाना खिलाते. वो आपके बर्ताव से बहुत प्रसन्न थी और अंततः उसने इस्लाम क़बूल कर लिया. 

अपने ऊपर कचरा फेंकने वाली महिला के साथ हज़रत मुहम्मद (स०) ने कोई बुरा सलूक नहीं किया बल्कि उसके साथ नर्मी का बर्ताव किया सो, जब रह्मतुल्लिलआलेमीन (सभी के लिए एक समान दया भाव रखने वाले) की उनपर कचरा फेंकने से तौहीन नहीं हुई तो कार्टून बनने से या उन्हें कुछ भी अपशब्द कहने से उनकी तौहीन कैसे हो सकती है? पैग़म्बर मोहम्मद (स०) तशद्दुद (हिंसा) के सख़्त मुख़ालिफ़ थे और अपने ऊपर कूड़ा फेंकने वाली बूढ़ी औरत को न सिर्फ़ माफ़ किया बल्कि उसकी तीमारदारी भी की मगर अपने पैग़म्बर को मानने वाली क़ौम उन्हीं के नाम पर हिंसा कर क्या उनकी शान में गुस्ताख़ी नहीं कर रही है?  पैग़म्बर मोहम्मद (स०) की शान में गुस्ताख़ी करने वाले कमलेश तिवारी के ख़िलाफ़ देश के कई हिस्सों में लाखों लोगों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया लेकिन सबसे भयावह मालदा का प्रदर्शन रहा। बेक़ाबू भीड़ हिंसा और आगजनी तक पर उतर गयी।

झूट बोलना, चुग़ली करना, चोरी करना, ज़ना करना, ज़ना बिल जब्र करना, सूद का लेन देन करना, जहेज़ का लेन देन जैसे तमाम बुरे कामों को करने से इस्लाम और उसके पैग़म्बर ने मना किया है मगर मुस्लिम क़ौम इन्हें धड़ल्ले से करती है। क्या अपने पैग़म्बर के हुक्म को न मानना पैग़म्बर की शान में गुस्ताख़ी नहीं है? जिस नमाज़ को हम बड़ी आसानी से छोड़ देते हैं वो पैग़म्बर मोहम्मद (स०) के आँखों की ठंडक है। ज़कात ग़ज़ब कर लेना, ग़रीबों-यतीमों का माल हड़प लेना, हराम माल खाना, नाप-तौल में कमी करना, मिलावट करना, हर काम में बेईमानी करना, पड़ोसियों को तंग करना जैसे तमाम ग़ैर इंसानी कामों को करने से भी ख़ुदा और उसके नबी ने मना किया है मगर हम बिना डरे करते हैं। पैग़म्बर की शिक्षा को दरकिनार कर देना पैग़म्बर की शान में गुस्ताख़ी नहीं है? 

मुसलमानों ! तुम पहले अपने गिरेबान में झाँको, अपनी ग़लतियों और गुनाहों पर शर्मिंदा होना सीखो और अपने कुकर्मों के लिए सड़क पर उतर कर अपने लिए सज़ा (चाहे वो फाँसी ही क्यूँ न हो) की माँग करो फिर दूसरों के लिए सज़ा की माँग करना। भारत में ईशनिंदा क़ानून नहीं है (क्यूँकि ये एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है) जो किसी को फाँसी हो जाए। क़ानूनी तरीक़े से सज़ा की माँग की जा सकती है मगर हिंसात्मक रूप से नहीं। 

देश का क़ानून तुम्हारे घर का क़ानून नहीं है जो तुम विरोध प्रदर्शन के दौरान तोड़ते हो ना ही पब्लिक प्रॉपर्टी तुम्हारी बपौती है जिसे तुम अपने गुस्से में फूँक देते हो। पहले सड़कों पर उतरने की तमीज़ सीखो फिर सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उतरना। आजकल सस्ती पब्लिसिटी पाने का सबसे आसान तरीक़ा है धर्म और धार्मिक लोगों पर कुछ भी बोल देना और उससे भी आसान तरीक़ा यूरोपीय और अमेरिकी देशों ने निकाला है पैग़म्बर को टारगेट करने का। चाहे वो कार्टून के ज़रिये हो या अपशब्द के ज़रिये. जिस अज़ीम शख्सियत को The 100: A Ranking of the Most Influential Persons in History में Michael H. Hart में पहले नम्बर पर रखा है वो किसी की घटिया सोच, कार्टून, अपशब्द या गाली से छोटा नहीं हो सकता.

कलतक कमलेश तिवारी को कोई नहीं जानता था पर आज हमने उसे इतना बड़ा 'ब्रांड' बना दिया है कि कल को वो चुनाव आराम से जीत जाए और यही RSS की रणनीति है जिसमें वो सफल हो गए और हमने ही उन्हें सफल किया है। लोग हमें उकसा देते हैं और हम भावना में बाह जाते हैं जब्कि हमें सब्र से काम लेते हुए पैग़म्बर की शिक्षाओं को आम करना चाहिये ताकि लोग ये जान लें कि कमलेश ने जो कहा वो सरासर बकवास और ग़लत है लेकिन हमने ठीक इसका उल्टा किया और आज कमलेश को ग़लत कहने की बजाय लोग मुसलमानों को ही ग़लत कह रहे हैं। जज़्बात और जाहिलियत में हमने अपना नुक़सान कर उनको फ़ायदा पहुँचाया है। कमलेश तिवारी और उसकी मण्डली जो चाहती थी, मुसलमानो ने ठीक वही किया। वो बयान देकर जितना फ़ेमस नहीं हुआ था हमलोगों ने उसके ख़िलाफ़ जुलूस कर उसे फ़ेमस दिया।

कर्नल बैंसला के नेतृत्व में जब लाखों गुज्जरों ने आरक्षण की माँग को लेकर रेल की पटरियाँ उखाड़ डालीं, सार्वजनिक संपत्तियों को स्वाहा कर दिया तब तो आपने उन्हें आतंकवादी नहीं कहा। हार्दिक पटेल के नेतृत्व में आरक्षण के लिए लाखों पटेलों ने और आरक्षण के लिए ही जब जाटों ने सार्वजनिक संपत्तियों को जलाया तब भी आपने उन्हें आतंककड़ी नहीं कहा। स्वर्णों ने जब दलितों को ज़िंदा जला दिया तब भी आपने स्वर्णों को आतंकवादी नहीं कहा। राजनीतिक राक्षकों ने जब गुजरात में मुसलमानों और ओडिशा में ईसाईयों को ज़िंदा जलाया तब भी आपने उन्हें आतंकवादी नहीं कहा तो आप मालदा के हिंसक मुसलमानों को आतंवादी कैसे कह सकते हैं? बाक़ियों की तरह इन्होंने भी सार्वजनिक संपत्तियों को ही स्वाहा किया है फिर 'आतंकवादी' का सर्टिफ़िकेट बाँटने में भेदभाव क्यूँ? आख़िर आतंकवादी की परिभाषा है क्या? 
मालदा की हिंसक घटना के लिए मैं मुसलमानों को आईना दिखा चूका चूका हूँ सो मुझपर मालदा की घटना को 'जस्टिफ़ाई' करने का ठप्पा न लगाइये। मैं तो बस आपके दोगलेपन के सामने आइना रख रहा हूँ। एक ग़लत घटना पर चुप्पी साध कर और दूसरी ग़लत घटना पर आलोचना कर सेलेक्टिव क्रन्तिकारी न बनिए। अगर आपने कमलेश के बयान के लिए कमलेश की आलोचना की है तभी आप मालदा की घटना के लिए वहाँ के मुसलमानों को गारियाईए। कुछ लोगों की नज़र में अच्छा बनने के लिए फ़र्ज़ी क्रांति का रायता न फैलाइये।

अकबरुद्दीन ओवैसी के बयान को आप 'हेट स्पीच' मान करवाई करते हैं, जेल भेजते हैं मगर कमलेश के बयान को 'ईशनिंदा' के क़ानून के आड़ में हम ख़ुद ही संरक्षण दे रहे हैं। धार्मिक मुद्दे पर घटिया और भड़काऊ बयान हेट स्पीच कैसे नहीं हो सकता? हेट स्पीच के लिए मियाँ मसूद जेल की सलाख़ों के पीछे पहुँचा दिए जाते हैं और आदित्यनाथ छुट्टे सांड़ की तरह घूमता है। योगियों और साध्वियों की ज़बान पर लगाम लगाने की हिम्मत तो है नहीं किसी में लेकिन सबमें इतनी हिम्मत ज़रूर है कि वो छुटते ही मुसलमानों को आतंकवादी बोल सके। लोगों की भावनायें और उनका विरोध भी धर्म देख उबलता है अपराध देख कर नहीं। 

मलेश तिवारी के बयान के बाद 'छुईमुई' जैसे लोग जो मुरझा गए थे वो मालदा की घटना के बाद 'हरित क्रांति' में बदल गए हैं. मुसलमानों और इस्लाम को गरियाने वाले ये क्रांतिकारी ये इस सवाल पे चुप्पी साध जाते हैं कि आखिर मालदा की घटना घटी ही क्यूँ, और इसके पनपने किसने दिया, भड़काऊ बयान के इतने दिनों बाद भी आख़िर कमलेश पर कोई करवाई क्यूँ नहीं हुई? कई क्रांतिकारी लोग तो कमलेश के बयान को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' मानते हैं तो कईयों ने मालदा में बसे 'आतंवादियों' की गिनती भी पूरी कर ली है. जो कल तक कमलेश के बयान के मौन समर्थन में मुरझा गए थे वही लोग मालदा के बहाने मुसलमानों को गरियाने के लिए लहालोट हुए पड़े हैं. अपने देश में मुसलमान शिक्षा के मामले में सबसे निचले पायदान पर हैं और संघी ब्रिगेड ये बाद जानती है कि जाहिलों को धर्म के आड़ में भड़का कर कैसे अपना उल्लू सीधा करना है. पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं और संघ ने अपनी तैय्यारी शुरू कर दी है. मालदा घटना के रूप में चुनावी बीज तो डाली जा चुकी है इंतज़ार है तो बस चुनावी फ़सल लहलहाने की. मालदा के मुसलमानों ने संघ के एजेंडे को ही कामयाब किया है फिर भी बदनाम मुसलमान हो रहे हैं, कमलेश तिवारी नहीं. जबतक मुसलमान अपनी शिक्षा के स्तर को नहीं बढ़ाते तब तक यूँ ही सड़कों पे उतर कर जाहिलियत और हिंसा फैला कर क़ौम को बदनाम करते रहेंगे जिसका खामियाजा हमें ख़ुद भुगतना पड़ेगा और फ़ायदा संघी ब्रिगेड उठाती हैं. अगर मुसलमानों को सड़कों पर उतरना ही है तो मुस्लिम समाज में फैली बुराईयों, कुरीतियों और अशिक्षा के ख़िलाफ़ उतरें, दूसरों को राजनीतिक फ़ायदा देने के लिए नहीं.
~
- नैय्यर इमाम

Monday, 29 February 2016

लघुकथा (भोजपुरी)

(एक)

 

‘का हो मदन, हे कुहासा में ई झोरा-झंटा ले के कहाँ कहाँ के तैयारी बा?’

‘जा तानी टिशन...बनारस खाती टरेन धरे के बा’

‘का बात...सब ठीक बा नूँ?’

‘हाँ, सब ठीके बा...दिल्ली जाए के बा’

‘दिल्ली...कौनो मरजेंसी बा का?’

‘ना...मरजेंसी तs नईखे कवनो, बाबुसाहेब से कह के ऐमस में लमर लगवईले रहनी तs ओईके तारीख बा काल्ह’

‘काल्ह के...हेतना जल्दी कवन टरेन से दिल्ली चहुँपबs?’

‘मोदी जी जवन नवका टरेन देहले बानी ओईसे...साँझी खा बा बनारस से?

‘ओही टरेनवा से नु हो जेईमें के टोंटियों लोग खोल लेहले बा?

‘हाँ...ओही से...लोग कहत बा कि बाड़ा गुदगर सीट बा आ भुलेट लेखा चलबो करेले...तबे तs सबेर होत-होत दिल्ली चहुँपावतो बिया’

‘जवन स्पीड से टोंटी गायब होता ओ हिसाब से ऐ टरेन के छठियार आवत-आवत ई पसिंजर मत हो जाव’

‘का मतलब?’

‘मतलब ई कि 200 रुपिया किलो रहर दाल खा के लोग टरेन के डिब्बा में हाजत खातिर थोड़े जात होई’

‘त टरेन के हाजत में लोग का करे जात होई?’

‘टोंटी चोरावे’

 

 

(दो)

 

‘ई कांग्रेस से देस के तs विकास देखल नईखे जात’

‘का हो गईल पांडे जी, काहे नथुना फुलावत बानी?’

‘ऐखबार ना पढ़े नी का, जे हमरा से पूछत बानी?’

‘ऐ घरी ऐखबार में पढ़े लायक कुछो रहते नईखे से बंद करा देहले बानी...बेमतलब पईसा डांढ देहला से का फायदा...खैर...रऊवा बताईं काहे नाक से धुवाँ छोड़त रहनी हँ?’

‘मोदी जी के कहनाम बा कि देश में एगो परिवार बा जवन विकास के हर काम में अड़ंगा डालत बा...ऊ परिवार नईखे चाहत जे देस विकास करो’

‘ना बुझनी...कौन परिवार भाई जी?’

‘बुझाता रऊवो दिमाग बान्हे धs के पकौड़ी खा लेहले बानी...आरे ऊहे माई-बेटा के परिवार’

‘ओह...मने दु गो सांसद मिलके 282 गो सांसद वाला पार्टी के विकास नईखे करे देत...तs का फायदा 56 इंच के सीना के’

‘बुझाता रऊवा दिमाग पर झाड़ू चल गईल बा’

‘झाड़ू...?’

‘हँ... हम बात करत बानी विकास के आ रऊवा अराजक लेखा बात करत बानी’

 

 

(तीन)

 

‘हमरा बुझाता कि 2019 ले राम मन्दिर बन जाई’

‘बाकिर...हमरा तs अईसे नईखे लागत’

‘काहे?’

‘काहे से कि मोदी जी कहले रहनी कि कम से कम 25 बरिस ले भाजपा के सरकार रही’

‘ऐईमें कवन दु राय नईखे...बाकिर मन्दिर 2019 ले काहे ना बनी?’

‘काहे से कि अगर मन्दिर 2019 में बन जाई तs भाजपा अगला 6 साल चुनाव का ओल के नाम लड़ी?’

‘काहे...कासी आ मथुरा तs बढ़ले बा अभी...आ विकास भी तs मुद्दा रही?’

‘अजोध्या ले रथ हाँके वाला तs मार्गदर्शक बन गईले तs कासी आ मथुरा के चुनाव के तीरे के लियाई?

‘दंगा’

~

 

- नैय्यर इमाम सिद्दीकी