Monday, 7 July 2014

याद

एक शायर था कभी
जो गुज़रते वक्तों के 
ज़र्रों के नीचे
दब के मर गया है कहीं
मगर कभी-कभी 
उसके लफ्ज़ 
जी उठते हैं
मेरी यादों के किसी कोने में
और ऐसा लगता है के जैसे
वो रत्ती भर ही सही
ज़िन्दा है मेरे अन्दर
.
.
.
ये वही तो है जो
मेरी शायरियों में ज़िन्दा है
और मैं ज़िन्दा हूँ
उसकी यादों में
~

© नैय्यर / 7-7-14

मुहब्बत

लैपटॉप के एक पुराने से फ़ोल्डर में 8 फ़रवरी 2013 को लिखी मेरी एक अधकचरी कविता मिली है. तब मैं कितना बेकार लिखता था, वैसे अच्छा तो अब भी नहीं लिखता मैं  
~

***_ मुहब्बत _***
============

तेरे नैनों के जलाशय में तैरते
आँसुओं की सतह पर
आस-व-निरास के हिंडोले में झूलते 
तुम्हारे सवाल मेरे लिए अजनबी नहीं हैं
तुमने पूछा था कि मुझे तुमसे मुहब्बत है या नहीं ?
और...हाँ
मैंने कहा था कि मुझे तुम से मुहब्बत नहीं
पर...शायद
तुम मेरी तरह आँखें नहीं पढ़ पाती
हाँ...मैंने कहा तो था कि मुझे तुम से मुहब्बत नहीं
मगर
वो सिर्फ एक ख़ूबसूरत मज़ाक़ था
और तुमने एक ज़रा सी बात पे
आँखों को दरिया बना डाला था
मैं तो तुम्हारे आँसुओं से
अपनी मुहब्बत की लौ भड़काना चाहता था
और
तुम्हारी आँसुओं से लबालब आखें
इस बात की सबूत हैं
की "मुझे तुमसे मुहब्बत है"
क्यूंकि तुम्हारे आंसू मेरी अमानत हैं
जो बहते भी तो मेरी वजह से हैं
आओ
मैं तुम्हारे आँसुओं की
एक-एक बूँद का क़र्ज़ उतार दूं
तुझे फिर से मैं संवार दूं
तेरा अंग-अंग निखार दूं
तेरी आँसुओं के जाम को
मैं होंठों से चुन के सहार लूं
आ तेरे अधरों का मैं रसपान करूँ
पलकों से धो लूं ज़ख़्म तेरे
कुछ अपनी रूह पे एहसान करूँ
तेरे अंगों का मधुशाला पी कर
पागल दीवाना हो जाऊं
तेरे होंठों पे रखूं होंठ गर
तो जल के परवाना हो जाऊं
तेरी जुल्फों की घनघोर घटा में
बन के नाचूँ मैं मोर सनम
तेरा चैन चौरा के, नींद चुरा के
कहलाऊँ मैं चोर सनम
हैं और बहुत से प्यार भरे कुछ लापरवाह इरादे
पर डरता हूँ की तेरे आँसुओं में बह न जायें ये सारे
है तुझे से इतनी गुज़ारिश मेरे महबूब सनम
के अब कभी न टूटने पाए अपना भरम
मेरी खुशियाँ तेरी खुशियाँ
तेरे ग़म हैं मेरे ग़म
तेरी आँख में मेरे सपने
मेरे सपने तेरे सपने
जैसे सारे सपने हैं बस अपने
सपनों का तो कोई बंटवारा नहीं
फिर...
क्यूँ तेरी आखों को मेरी आखों की भाषा
लगती है अजनबी सी
जब भी तू मुझ से सवाल करे है
मेरा दिल मुझ से बवाल करे हैं
तू देख ले मेरी आँखों को
इनमे हैं बस तेरा ही अक्स
बस पढ़ नहीं पाती आँखें तेरी
क्यूंकि
तेरी आँखें हैं धुंधली धुंधली
और आँसुओं से भरी तेरी धुंधली आखें
भला कैसे देखेंगी
मेरी आँखों में तेरी लिए चाहतों के समंदर को
मेरी धडकनों को सुनो ज़रा
ये हर पल कहती रहती है
"मुझे तुमसे मुहब्बत है"
तो अब मेरी धडकनों को करार दो
मेरा सारा क़र्ज़ उतार दो
आ जाओ मेरी बाँहों में
मुझे बेइन्तहा प्यार दो
और आँसुओं कि नदी में
सारा बोझ उतार दो
~

© नैयर / 8 फ़रवरी-2013
"किसी को चाहने की आदत जब ज़रुरत बन जाए तो ये मुहब्बत में मुब्तला होने की पहली तस्दीक़ होती है. वैसे, प्यार जब अपनी हद से गुज़र जाता है तो मुहब्बत की आगोश में आ जाता है और जब मुहब्बत अपनी दहलीज़ के बाहर क़दम रख देती है तो इश्क़ के जज़ीरे पे जा पहुँचती है, जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं." - Naiyar Imam Siddiqui 

Tuesday, 1 July 2014

मिर्ज़ा ग़ालिब से मुलाक़ात

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता

- मिर्ज़ा ग़ालिब

मैं जब कभी भी दिल्ली आता हूँ चचा ग़ालिब से मिलने ज़रूर जाता हूँ. पिछले दिनों यानी 21 जून को भी उनसे मिलने गया. उनके आरामगाह में जा के कहा - आदाब अर्ज़ है मिर्ज़ा ! मिर्ज़ा ने कोई जवाब नहीं दिया, देते भी कैसे? नाराज़ जो थे. आख़री बार ढंग से दिसम्बर 2009 में मिला था उनसे, जब कुहासे को चीरती हुई तिरछी नर्म धुप उनके आरामगाह के ऊपर पड़ रही थी और हमने ढेर सारी बातें की थी. उसके बाद जब भी दिल्ली आया मसरूफ़ियत की ज़ंजीर पहन के आया. बस चलते चलाते बस से ये निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन से निकलते हुए उनकी तरफ सलाम उछाल दिया, कभी आराम से बैठ के बात ही नहीं कर सका. सो, अब जो तपती दोपहर में उनसे मिलने गया तो उनकी नाराज़गी धुप की शिद्दत से कहीं ज़्यादा थी. चचा को मनाना था सो निकल पड़ा उनकी हवेली की तरफ़. पुरानी दिल्ली की तारीख़ी गालियाँ जिनकी हर ईंट से इतिहास की सिसकियाँ सुनाई देती हैं, उन्ही गलियों में एक है कूचा-ए-चीलान. जमा मस्जिद के गेट नम्बर-2 से मटिया महल होते हुए निकल गए उस तरफ़. उसी गली में मिला बरसों पुरानी हवेली का खंडहर, जाने वो हवेली किसक थी? हवेली से थोड़ी दूर आगे एक मस्जिद के दरवाज़े पे संगमरमर के छोटे से टुकड़े पे मस्जिद के नाम-पते के साथ लफ्ज़ 'गली मोमिन वाली' उगे हुए थे. याद आये आपको हाकिम मोमिन खान? नहीं न...उनका एक मशहूर शे'र सुनाता हूँ शायद याद आ जायें - ''वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो, वही वादा यानी निबाह का तुम्हें याद हो के न याद हो'' याद आ गए न मोमिन साहब? तो मैं बता रहा था कि इन मोमिन साहब की हवेली किसके क़ब्ज़े में है आज तक पता नहीं, अगर मस्जिद के दरवाज़े पे गली मोमिन वाली' नहीं उगा होता तो ये इतिहास भी मिटटी हो चूका होता कि इसी गली में उर्दू के मशहूर शायर हकीम मोमिम खान 'मोमिन' रहा करते थे कभी. कूचा-ए-चीलन की तंग गली से निकल के हम चूड़ीवालान की तरफ़ बढे. पुराने तर्ज़ की होटल पे बड़े ग्लास में चाय की चुस्कियों की बीच गुलज़ार की नज़्म होंटों से चिपकने लगी और ज्यूँ-ज्यूँ हम बल्लीमारान की तरफ़ बढे गुलज़ार के लफ्ज़ ज़िन्दा होने लगे.

बल्‍लीमारान के मुहल्‍ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियां
सामने टाल के नुक्‍कड़ पे बटेरों के क़शीदे
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वाह,
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमियाने की आवाज़
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अंधेरे
ऐसे दीवारों से मुंह जोड़के चलते हैं यहां
चूड़ीवालान के कटरे की बड़ी बी जैसे
अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाज़े टटोलें
इसी बेनूर अंधेरी सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चराग़ों की शुरू होती है
एक क़ुराने सुख़न का सफ़ा खुलता है
असद उल्‍ला ख़ां ग़ालिब का पता मिलता है

- गुलज़ार

गली क़ासिम में चचा ग़ालिब की हवेली जो 1996 तक अवैध क़ब्ज़े में रही, उसमें हीटर फैक्ट्री चला करती थी. बड़ी मुश्किलों से सरकार कुछ हिस्सा ही ख़ाली करा पाई है. अभी भी अवैध क़ब्ज़े वाले क़ब्ज़ा जमाये बैठे हैं, उनकी आँखों में ज़रा भी शर्म नहीं. जो हिस्सा सरकार ख़ाली करा पाई है उसके एक हिस्से में गुलज़ार का दिया ग़ालिब चचा की एक खुबसूरत स्टेचू रखी है, उनके कुछ बेहतरीन शे'र उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे गए हैं, एक खुबसूरत पेंटिंग लगाई गई है. कुल मिला के उनकी रूह और उनके दिल को बहलाने का साज़-वो-सामन इकठ्ठा किया गया है. भले ही चचा ग़ालिब अपने ससुर के पुश्तैनी क़ब्र जो निज़ामुद्दीन बस्ती में है वहाँ आराम कर रहे हैं लेकिन उनकी रूह तो हवेली में ही रची-बसी है. तभी तो जब उनकी हवेली गया और उनके अंगूठे को हिलाया तो ग़ज़ल लिखते हुए चौंक के मेरी जानिब देखा और आरामगाह पे किये सलाम का जवाब झट से दे दिया. पल में सारे गिले-शिकवे दूर हो गए. उनसे बिछड़ना आसान तो न था लेकिन मैं फिर से मिलने के लिए बिछड़ गया. हवेली से निकलते वक़्त हलकी-हलकी बूंदा-बांदी शुरू हो चुकी थी.

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आंख ही से ना टपका तो फिर लहू क्‍या है

- ग़ालिब

चचा ग़ालिब से मिलने के बाद हम फतेहपुरी मस्जिद की तरफ़ चले, मस्जिद के अहाते में बहुत देर तक बैठे रहे और नमाज़-ए-अस्र अदा कर के वहाँ से निकले. फतेहपुरी मस्जिद चांदनी चौक की पुरानी गली के पश्चिमी छोर पर है. इसे शाहजहाँ की पत्नियों में एक फतेहपुरी बेग़म नें 1650 में बनवाया. वो फतेहपुर की थीं इसलिए फतेहपुरी बेग़म के नाम से मशहूर हुईं. 1857 के सवतंत्रता संग्राम में मुग़ल शहंशाह बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में लड़ने वाले कई मुस्लिमों की कब्रें भी मस्जिद के अहातें में हैं. स्वतन्त्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने इस मस्जिद को नीलम कर दिया जिसे लाला चुन्नामल ने उस वक़्त मात्र 11000 रुपये में ख़रीद लिया. 1877 में चार गाँव के बदले में इस मस्जिद को वापस मुसलमानों को सरकार ने वापस कर दिया.

मैं सच कहूँगा तो न आएगा तुझे मुझ पे यकीं
आईने से पूछ वो सच परखने का हुनर जानता है

- नैय्यर

Adnan Kafeel साहब का शुक्रिया, जो मेरे साथ तपती दोपहरी में दिल्ली की गलियों की ख़ाक छानते रहे, यूँ कहूँ कि इन्होने ने ही मुझे इन गलियों और उनके इतिहास से आशना कराया को ग़लत न होगा. सारी तसवीरें इन्होने ही ली है जिसके लिए ढेर सारा शुक्रिया, पर मैंने इनकी कोई भी तस्वीर ढंग की न ली  फिर कभी सही...अब तो इन गलियों में मेरे क़दमों के चाप पड़ते रहेंगे. मिर्ज़ा को फिर से आदाब.
 (5 photos)

Sunday, 29 June 2014

कहानी / नश्तर

29 June 2014 at 18:30
''क्या हम कभी एक नहीं हो सकते?'' उन्होंने बड़ी आस से मुझ से पूछा.

"दो इंसान जो प्रेम बंधन में बंधना चाहें और समाज की दकियानूसी रिवाजों की वजह से एक ना हो पाएँ वो उस सुखी नदी के दोनों किनारों जैसे होते हैं जो जन्म से मृत्यु तक साथ तो चलते हैं मगर कभी मिल नहीं पाते. नदी की सुखी रेत अनबुझे आरज़ुओं, ख्वाहिशों जैसी होती जो गाहे बगाहे दिल में उठते जज़्बात की तर्जुमानी करते हैं और दोनों किनारों को अपनी आगोश में लेकर मुहब्बत की अलहदा क़ब्र बना देती है जिसके अन्दर दो मासूम दिलों के जज़्बात हमेशा-हमेशा के लिए घुट के मरने को मजबूर हो जाते हैं, पर भला मुहब्बत भी कभी मरती है क्या? मर जाती तो अगली नस्ल वालों तक मुहब्बत पहुँचती ही नहीं और ना वो मुहब्बत से आशना होते...पर मुहब्बत तो अमर है. ये जिस्म में नहीं रूह में परवान चढ़ती है. नस्ल-दर-नस्ल मुहब्बत किताबों में महफूज़ होता आया है. कामयाब मुहब्बत इतिहास के पन्नों में ज़िंदा हैं और नाकाम मुहब्बत अफसानों में" - मैंने उनकी बात के जवाब में कहा?

''मुझे आपकी बातें सुनने में तो अच्छी लगती हैं पर समझ में नहीं आती'' - फ़ोन पे उनकी ख़ुमार भरी मखमली आवाज़ उभरी.

''सच्ची मुहब्बत कभी नहीं मिलती, लैला-मजनूं, हीर-राँझा, शीरीं-फरहाद या रोमियो-जूलियट को देख लीजिये. दर हक़ीक़त प्यार का पहला, इश्क़ का दूसरा और मुहब्बत का तीसरा लफ्ज़ अधुरा है. जो ख़ुद में ही अधूरे हैं वो अपनी आगोश में आये परवानों को भला कैसे मुकम्मल कर दें? शम्मा के इश्क़ में परवाना जल के अपनी जान दे देता है और शम्मा सारी रात अकेले अपने आशिक़ के याद में जलती रहती है. सच्ची मुहब्बत जुदा हो के ही मुकम्मल होती है'' - मैंने उन्हें समझाने की आख़री कोशिश की.

''मैं नहीं मानती ये सब, कितने लोग तो मिलते हैं इसी दुनिया में...क्या वो सच्ची मुहब्बत नहीं करते? आप मुझे दिलासे ना दीजिये, मुझे पता है कि मैंने क्या खो दिया है और क्या खो रही हूँ'' - उसने बड़ी बेबसी से कहा. उनकी यही बेबसी नश्तर की तरह मेरे दिल के पार हो गयी.

''मेरे बस में होता तो मैं अपनी जान दे के भी उन लबों की लाली को जिंदा रखता जिन लबों ने मुझे मुझ से माँगा था. ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी के लबों पे मेरा वजूद उनकी आरज़ू बन के उभरा और मेरा घर-परिवार जो सामाजिक कुरीतियों और समाज के ढकोसले को मुझ से ज़्यादा अहम समझता है उसने दो दिलों के बीच न मिटने वाली खाई पैदा कर दी और मैं अपने घरवालों के खिलाफ़ बग़ावत तक न कर सका, हालाँकि लड़ाई तो बहुत की मैंने पर समाज जीत गया, रीति-रिवाज जीत गए और मैं हार गया. भला हारा हुआ कोई शख्स किसी को कुछ दे सकता है? दिल की सल्तनत तो पहले ही उनके नाम कर दी है. जिसने सांसें उधार दी हैं, जिन्होंने नाम उधार दिया है वो जब चाहे सूद समेत वापस ले सकते हैं , मैं उफ़्फ़ तक न करूँगा क्यूंकि जिंदा लाश एताजाज़ नहीं किया करते" - मैं बस सोच के रह गया और करवट बदल के फोन दायें कान से हटा बायें कान से लगा लिया.

''रात के तीसरे पहर जब नींद की हलकी सी खुमारी मेरी आवाज़ को बोझल बना रही थी उनकी बातों के असर से दिल लहू-लहू हो रहा था. जवाब क्या देता मैं उनके सवाल का? मेरे पास तो देने के लिए कुछ भी नहीं था, न अपना वजूद ना जवाब. ख़ामोश भी तो नहीं रह सकता था. बात को बदलने के लिए मैंने पूछ लिया कि आप कब से यूँ टहल-टहल के मुझ से बात कर रही हो, थकी नहीं क्या? जाइये सो जाइये फिर बात करेंगे.

''साफ़ कहिये ना कि आप मुझे भगाना चाहते हैं" - वही ख़ुमार भरी मखमली आवाज़ फिर से मेरे कानों के अंतर तहखानों तक उतर तो गयी मगर मुझे झिंझोड़ के रख दिया. इस लड़की से जीत पाना मुश्किल है, जाने दिलों के भेद कैसे पढ़ लेती है. हालाँकि दूर तो मैं भी नहीं होना चाहता था उनसे पर उनकी बातों का क्या जवाब देता मैं? हारने से तो बेहतर था कि इलज़ाम ले के जिया जाए, पर मुहब्बत में इलज़ाम कैसा? ये तो भरोसे हैं जो दिलों के गाँठ को मज़बूत करते हैं.

''आपकी आवाज़ बहुत सॉफ्ट है, मुझे बहुत पसंद है आपकी आवाज़'' कभी का कहा हुआ उनका फिकरा याद आ गया और उनकी बातों की सहर की ज़द में तो मैं था ही. बे-इख्तयार मेरे लबों पर फ़िल्म आँधी का ये गाना उभर आया -

तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई
शिकवा तो नहीं, शिकवा नहीं, शिकवा नहीं
तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन
ज़िन्दगी तो नहीं, ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं
तेरे बिना..

काश ऐसा हो
तेरे क़दमों से चुन के मंजिल चलें
और कहीं, दूर कहीं
तुम गर साथ हो
मंजिलों की कमी तो नहीं
तेरे बिना..

इस गाने को मैंने बहुत दिल और दर्द के साथ गाया और शायद ये गाने का ही असर था कि वो कुछ नार्मल हो गयीं थीं. जब गला रुन्धने लगा तो मैंने कहा कि अब सो जाइये अब कल बात करेंगे. शायद वो भी बहल गयीं थी जो तुरंत मान गयीं.

''ओए, सुबह हो गई?'' - दोपहर से ज़रा पहले उनका मैसेज आया.

''जी, मेरी सुबह तो कबकी हो चुकी है'' -मैंने जवाब दिया.

" :( मेरी सुबह तो दस बजे हुई" - फिर से मैसेज उभरा.

''अब मैंने उनको कैसे बताता कि सुबह तो उनकी होती है जो रात में सो जाते हैं, जिसने सारी रात आँखों में काटी हो उसकी कैसी सुबह?'' जिसके सीने में लफ़्ज़ों के नश्तर चुभे ho, जो एहसास को छलनी कर रहे हों, उसे भला नींद कैसे आएगी? उसकी सुबह कैसे होगी भला?

जाने ये नश्तर की चुभन थी या रतजगे का असर था के आँख फिर से गीली हो चुकी थी पर वो इस बात से बेख़बरमैसेज किये जा रही थीं. और फिर से अधुरा गीत मेरे होंटों पे सजने लगा.

जी में आता है
तेरे दामन में सर छुपा के हम
रोते रहें, रोते रहें
तेरी भी आँखों मेंआंसुओं की नमी तो नहीं
तेरे बिना...

जो भी हो ये उन्हीं का करम है कि मैं ये जान पाया के किसी पे मर के भी कैसे जिया जाता है. वो मेरी क़िस्मत में ना सही लेकिन उनका क़ुर्ब मेरी चाहतों की राह हमवार ज़रूर कर देगा.

इसी उम्मीद के साथ मैंने उनको चाँद में उकेरा है और इतनी आरज़ू की है कि बस आप एक बार ग़म की रात को रोक लो, चाँद को ढलने ना दो फिर रौशन सुबह तो अपना ही होगा.

तुम जो कह दो तो
आज की रात चाँद डूबेगा नहीं
रात को रोक लो
रात की बात है
और ज़िन्दगी बाकी तो नहीं
तेरे बिना..

~
© नैय्यर इमाम / 29-06-2014

Monday, 16 June 2014

लघुकथा / जेल

***_ लघुकथा / जेल _*** 
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''कब तक मुँह बनाये बैठे रहोगे? तुम्हें यहाँ आये तीन दिन से ज़्यादा हो गया है और...''

बैरक का सबसे पुराना क़ैदी उस से बातें कर रहा था पर उसके लटके हुए मुँह को देख के उसने अपनी बात अधूरी रहने दी. 

बैरक में छाई ख़ामोशी से उकता कर थोड़ी देर बाद उसने फिर कहा - ''कपड़े-लत्ते से तो तुम शरीफ़ लगते हो और शकल से पढ़े लिखे भी...फिर भला तुम किस जुर्म में अन्दर हो?''

''मैंने बस फेसबुक पर अपने दोस्त का क्रांतिकारी टाइप स्टेटस लाइक किया था और वो भी इसी जेल में किसी दुसरे बैरक में बंद है'' - उसने घुटने पे रखे हाथ पे ठोड़ी टिकाये हुए कहा.

''फिर उदास क्यूँ हो? क्रांतिकारियों के लिए तो जेल स्वर्ग हुआ करता है'' - उसने अपनी मुछों को मरोड़ते हुए कहा.

''या तो क्रांति बंद करो या जेल में जीने की आदत बना लो'' - बीड़ी सुलगाते हुए उसने अपना ज्ञान उंडेला और एक लम्बा कश खींच के धुवें के छल्ले उड़ाते हुए गुनगुनाने लगा.

''इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार
दीवार-वो-दर को ग़ौर से पहचान लीजिये''

~
- नैय्यर / 16-06-2014

Tuesday, 10 June 2014

लम्हे

कुछ लम्हों का कोई रंग नहीं होता, न ख़ुशी में धुप खिलती है है ना ग़म में परछाई. ये लम्हे कभी नहीं खिलते, इनडोर प्लांट की तरह. पौधों के पत्ते और जिस्म में सांस सिर्फ 'ज़िंदा' होने के सबूत भर हैंकुछ लम्हों का कोई रंग नहीं होता, न ख़ुशी में धुप खिलती है है ना ग़म में परछाई. ये लम्हे कभी नहीं खिलते, इनडोर प्लांट की तरह. पौधों के पत्ते और जिस्म में सांस सिर्फ 'ज़िंदा' होने के सबूत भर हैं.