Monday, 21 September 2015



मेरे सवाल "क्या आप मुझसे शादी करेंगी?" का बजाए जवाब देने के उसने तमक कर साढ़े सैंतालिस डिग्री के कोण से मेरे चेहरे को घूरते हुए पूछा, - "कभी अपनी शकल देखी है आईने में?" मैंने उसकी शर्बती आँखों को नज़रों से चखते हुए कहा, - “आज तक तो मैं अपनी शकल आईने में ही देखता आया हूँ और अगर आप मेरे सवाल का जवाब ‘हाँ’ में दे दें मैं वादा करता हूँ कि मैं जल्दी ही अपनी शकल आपकी इन झील सी आँखों में देखने लगूँगा”. 

‘बड़े बदतमीज़ हो तुम’, उसने अपनी आँखों पे चश्मा जमाते हुए कहा.

‘जी, ज़र्रा नवाज़ी का बहुत-बहुत शुक्रिया लेकिन मैं आपकी इस तारीफ़ को इक़रार समझूँ या इनकार?’ चश्मे के पीछे छुपी उसकी आँखों को घूरते हुए मैंने पूछा.

‘तुम्हारा सर’ ... और वो पैर पटकती वहाँ से चली गयी. 
~
- नैय्यर / 21-09-2015
 

Tuesday, 1 September 2015

औरंगज़ेब : व्यक्तित्व का छुपा पहलु

अबुल मुज़फ़्फ़र मुहियुद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर मुग़ल शहंशाहों में पहला शहंशाह हुआ जिसने क़ुरआन हिफ़्ज़ किया। सम्राट अकबर के ज़माने से ही हिन्दू मनसबदारों के साथ उदार रवैय्या रखा जाता था जिसे औरंगज़ेब ने भी अपनाया और अपने दरबार में किसी भी हिन्दू को उसके हिन्दू होने की वजह से उसके जायज़ हक़ या तरक़्क़ी से नहीं रोका।
शाहजहाँ हाथियों की लड़ाई देख रहे थे। शहज़ादा औरंगज़ेब हथियार से लैस घोड़े पर सवार मैदान के एक कोने में खड़ा था कि अचानक एक हाथी के हलक़ से बड़ी ख़ौफ़नाक चिंघाड़ निकली। शहज़ादे ने चौंक कर उसे देखा और फ़ौरन अंदाज़ा लगा लिया कि हाथी पर पागलपन का दौरा पड़ने वाला है। हाथी का महावत भी घबरा गया। उधर हाथी ने अपनी सूँढ़ उठाए क़रीब खड़े घोड़े पर हमला कर दिया। शहज़ादा भी मैदान में डट गया। शाहजहाँ आख़िर बाप था उसने गरज कर सिपाहियों को हुक्म दिया, "हाथी को ख़त्म कर दिया जाए" मगर शहज़ादे ने तेज़ आवाज़ में कहा, "अब्बा हुज़ूर ! सिपाहियों को रोकिये, मैं अल्लाह के हुक्म से हाथी का मिजाज़ दुरुस्त कर दूँगा" और अपना भाला हाथी के जिस्म में घोंप दिया जिससे हाथी और पागल हो गया और उसने शहज़ादे के घोड़े को अपनी सूँढ़ में लपेटा और ज़मीन पर पटक दिया। इसी बीच शहज़ादा फुर्ती से घोड़े से नीचे कूद चूका था। उसने अपनी तेज़धार तलवार म्यान से निकली और और ऐसा ज़बरदस्त वार किया कि हाथी की सूँढ़ कट कर दूर जा गिरी। इस ज़ख़्म से हाथी के होश ठिकाने आ गए और वो मैदान से भाग खड़ा हुआ। शहंशाह नेे मसनद से उठ कर शहज़ादा औरंगज़ेब को गले से लगाया और उसी वक़्त सबसे ख़तरनाक इलाक़े बलख़ पर हमला करने वाली फ़ौज का सिपहसालार बना दिया। तब औरंगज़ेब की उम्र महज़ 14 साल थी।
काफ़ी देर से औरंगज़ेब की फ़ौज़ जंग की तैयारी कर रही थी क्योंकि इस बार लड़ाई उज़बेग बाग़ियों से था जो बहुत दिलेरी से लड़ते थे। तैयारी पूरी होते ही शहज़ादा औरंगज़ेब शाही फ़ौज लेकर चल पड़ा और बलख़ शहर के क़रीब पहुँच कर उसने उसने ख़ेमे गड़वा दिए। उज़बेग लड़ाके गुरिल्ला जंग के बड़े माहिर थे। वो छुप कर बैठे रहते फिर मौक़ा पाकर अचानक हमला करते और फ़ौज को नुक़सान पहुँचा कर भाग जाते। शहज़ादे ने दुश्मन सरदार को पैग़ाम भेजा कि ''मेरी फ़ौज तुम्हारी फ़ौज से कम है मगर मेरा हौसला तुमसे चार गुना ज़्यादा है, मैदाने जंग में आकर आज़मा लो।'' दुश्मन सरदार को शहज़ादे की ललकार पसंद आई और वो अपनी भारी फ़ौज लेकर मैदान में आ गया। घमासान की लड़ाई होने लगी। इसी बीच अस्र की नमाज़ का वक़्त हुआ। शहज़ादे ने अपनी तलवार रोक दी, घोड़े की जीन से दबी जाय-नमाज़ खींची और मैदाने जंग में ही एक तरफ़ खड़ा होकर नमाज़ पढ़ने लगा। उज़बेग सरदार ने जब शहज़ादे को सुकून से नमाज़ पढ़ते देखा तो मारे हैरत के उसकी आँख खुली की खुली रह गयी। उसने चिल्ला कर अपनी फ़ौज को हुक्म दिया, "अपने हाथ रोक लो, इस शख़्स को अपने ख़ुदा पर इतना भरोसा है कि इससे लड़ना तक़दीर से लड़ने वाली बात है।" दोनों फ़ौजों में सुलह हो गई और उज़बेग सरदार ने शहज़ादे से दोस्ती कर ली। इस तरह औरगज़ेब पहला मुग़ल हुआ जिसने बलख को मुग़ल साम्राज्य में मिलाया।
मौलाना सालेह जैसे बुज़ुर्ग उस्ताद ने औरगज़ेब को क़ुरआन हिफ़्ज़ कराया था। शहज़ादा मौलाना सालेह के साथ साथ अपने सभी उस्तादों का बहुत एहतराम करता था। उसकी ये आदत शहंशाह बनने के बाद भी जारी रही। शहज़ादा कहा करता था कि ''उस्ताद इल्म देकर हैवान से इंसान बनाता है इसलिए उसकी इज़्ज़त करनी चाहिए।''
औरगज़ेब को हुक़ूमत करते कई साल गुज़र चुके थे। अब वो सारे हिन्दुस्तान का शहंशाह था। एक दिन मौलाना सालेह की बीवी ने अपने शौहर से कहा, "तुम्हारा शागिर्द बहुत बड़ा बादशाह बन गया है। तुम जाकर उससे बात करो तो वो हमारी ग़रीबी को बहुत आसानी से दूर कर सकता है।" मौलाना सालेह ने बहुत आराम से बीवी को समझाया, "नेक बख़्त ! क्यूँ मेरी नेकी बर्बाद करने पर तुली बैठी हो? उस्ताद अपने शागिर्द को देता है, लेता कुछ नहीं। दूसरी बात ये कि मेरा शागिर्द नाजायज़ काम करने को पसंद नहीं करता और अगर उसने मुझे दौलत वग़ैरह देने की कोशिश की तो मैं समझूँगा कि मेरी मेहनत बर्बाद हो गयी।" मौलाना सालेह ने अपनी बीवी को समझाने की बहुत कोशिश की मगर वो अल्लाह की बंदी अपनी ज़िद पर क़ायम रही।
आख़िरकार मौलाना सालेह ने हथियार डाल दिए और अपने शागिर्द से मिलने की तैयारी करने लगे। मौलाना सालेह एक ग़रीब इंसान थे मगर ख़ाली हाथ बादशाह के दरबार में जाना भी उन्हें पसंद नहीं था। उनकी बीवी ने गुड़ मिले आटे के गुलगुले बना दिए और एक मिट्टी के बर्तन में उसे बंद कर दिया। मौलाना सालेह ये तोहफ़ा लेकर शाही दरबार की तरफ़ रवाना हो गए। शदीद गर्मी का मौसम था, लम्बा सफ़र करके जब वो शाही दरबार में पहुँचे तो गुलगुलों से बदबू आने लगी थी। औरगज़ेब तख़्ते शाही पे बैठा कोई मुक़दमा सुन रहा था कि उसकी निगाह अपने उस्ताद पर पड़ी। वो फ़ौरन तख़्त से नीचे उतर पड़ा और भागता हुआ उस्ताद के सामने एहतराम से झुक गया। फिर बहुत इज़्ज़त से उन्हें तख़्त पर बिठा कर उनसे बातें करने लगा। "बरखुरदार औरंगज़ेब ! तुम्हारी माँ ने तुम्हारे लिए ये तोहफ़ा भेजा है" उस्ताद ने मिट्टी का बर्तन बादशाह के हवाले करते हुए कहा। औरंगज़ेब मिट्टी का बर्तन लेकर अपनी तख़्त पर जा बैठा और एक गुलगुला उठा कर मुँह में रखा। वह इतना बद-ज़ायक़ा और बदबूदार था कि कोशिश के बावजूद औरंगज़ेब उसे निगल नहीं सका। उस्ताद ने शागिर्द की हालात देखी तो उन्हें जलाल आ गया और कहने लगे, "मुहियुद्दीन औरंगज़ेब क्या बात है, बादशाह बन कर हलाल का निवाला खाने की आदत नहीं रही जो अब मिठाई भी तुम्हारे गले में अटकने लगी है?" सारे दरबार में ख़ामोशी छा गई। औरगज़ेब ने फ़ौरन गुलगुला निगल लिया और मुस्कुरा कर कहा, "हुज़ूर ! ऐसी कोई बात नहीं, मेरी तरफ़ से अम्मा जान का शुक्रिया अदा कीजियेगा। दरअसल मैं बे-वक़्त खाने का आदि नहीं इसलिए ज़रा मुश्किल हुई थी वरना मिठाई तो वाक़ई बहुत लज़ीज़ है।"
बादशाह ने एक और गुलगुला मुँह में डाला और आराम से खाते हुए मिट्टी का बर्तन अपने बेटे के हवाले कर दिया और मुस्कुरा कर कहा, "इसे हिफ़ाज़त से घर पहुँचा दो।" शहज़ादे ने दरबार से बाहर आकर मिठाई चखी तो उसे उबकाई आ गयी। उसने फ़ौरन मिठाई ज़मीन पर थूक दिया मगर शाहज़ादे को उस्ताद का मर्तबा और बाप की अज़मत का अंदाज़ा हो गया था।
औरंगज़ेब मुल्क की भलाई और तरक़्क़ी के कामों में इतना मसरूफ़ रहता था कि वो सिर्फ़ तीन घंटे सोता था। वो कुशल शासक होने के साथ ही बेहतरीन ख़त्तात था। उसने शाही ख़ज़ाने को अवाम का ख़ज़ाना समझा और उसे कभी अपनी ज़ाती ज़रूरतों के लिए ख़र्च नहीं किया। अपने घर में नौकर तक नहीं रखा और ख़र्च बचाने के लिए उनकी बीवी ख़ुद खाना बनाती थीं। औरंगज़ेब क़ुरआन के नुस्ख़े लिख कर और टोपियाँ सी कर अपने परिवार का ख़र्च पूरा करता मगर शाही ख़ज़ाने की अमानत में कभी ख़यानत नहीं की।

जवाब

लाजपत नगर के 'वेस्टसाइड' से शॉपिंग कर दोनों हाथों में बैग थामे निकला तो घड़ी की सुईयाँ रात के 10:55 बजने का इशारा कर रही थीं। पास से गुज़रते रिक्शे को सर के इशारे से रोका और तेज़ क़दम बढ़ाते हुए 'मेट्रो' कह बैठ गया। चारों बैग्स को बग़ल में रख वॉलेट में चेंज टटोला और डेबिट कार्ड को शर्ट की ऊपरी जेब से निकाल कर वॉलेट में रखा और बीस का नोट रिक्शे वाले को देने के लिए उसमें से निकाल लिया।
- 'ज़रा तेज़ चलो यार', वॉलेट पैंट की पिछली जेब में सरकाते हुए मैंने कहा।
- 'भाई साब, ! ये रिक्शा है, कोई प्लेन थोड़ी न है जो चलने की बजाय उड़ने लगे', उसने पैडल पर दबाव बढ़ा कर गर्दन पीछे मोड़ते हुए कहा। मैंने अपने बैग्स उठा कर गोद में रखे और स्ट्रीट लाइट के लैम्प्स से बिखर कर सड़क पर गिरती पीली रौशनी की क़तार को देखने लगा। मेट्रो स्टेशन पहुँचते ही मैं बैग्स सँभालते हुए उतरा और उसे बीस का नोट थमाते हुए आगे बढ़ गया तभी पीछे से उसकी आवाज़ उभरी।
- 'दस रुपये और', पसीना पोंछते हुए उसने कहा।
- 'पर...किराया तो बीस ही रुपये है फिर दस रुपये...'
- 'साब टाइम भी तो देखो, 11 से ऊपर हो गया है'
- 'तो...रिक्शे वालों ने भी नाईट चार्ज वसूलना शुरू कर दिया क्या?'
- 'साब पेट क्या सिर्फ़ ऑटोवालों के ही पास होता है क्या?' उसके जवाब ने मुझे लाजवाब कर दिया और मुझसे कुछ कहते नहीं बना। चुपचाप उसे दस का नोट थमाया और स्टेशन के अंदर दाख़िल हो कर सिक्यूरिटी चेकिंग की तरफ़ बढ़ चला।
जब प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचा तो वहाँ लगी घड़ी 11:19 का वक़्त बता रही थी और अभी मेट्रो ट्रेन आने में तीन मिनट बाक़ी थे। प्लेटफ़ॉर्म पर ब-मुश्किल 15 से 18 लोग थे। रात की तारीकी स्टेशन को छोड़ बाक़ी सबको अपनी कालिख में धीरे-धीरे रंग रही थी तभी ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आ लगी। पाँच स्टेशन पार कर केंद्रीय सचिवालय तक पहुँचने में महज़ दस मिनट का वक़्त लगा। केंद्रीय सचिवालय से मैंने वायलेट लाइन छोड़ येलो लाइन की मेट्रो पकड़ी। भीड़ न के बराबर थी, कई सीटें ख़ाली थी फिर भी दिन भर ऑफ़िस में बैठे रहने की वजह से बैठने का दिल नहीं चाहा सो बोगी के दरवाज़े के ठीक सामने वाली स्टैंड से पीठ टिकाया और बैग्स को पैरों के बीच में रख दिया। अगले स्टेशन पटेल चौक पर वो चढ़ी और खम्भे से पीठ टिका कर मेरी दूसरी तरफ़ मुँह करके खड़ी हो गयी। मैं कनखियों से उसका चेहरा देखना चाहा पर नाकाम रहा। राजीव चौक पर भीड़ का एक रेला आया ख़ाली पड़ी सीटों पर बिखर गया। भीड़ को रास्ता देने के चक्कर में वो मेरे बाएँ तरफ़ खिसक कर आ चुकी थी। ऍफ़.एम के चैनल बदलते हुए मेरी नज़रें व्हॉट्स एप्प पर मैसेज टाइप करती उसकी उँगलियों पर टिक गयी। तराशे हुए नाख़ूनों पर बेबी पिंक कलर की नेल पॉलिश बहुत जँच रही थी। नाख़ून बढ़ने की वजह से जड़ की तरफ़ के सफ़ेद नाख़ून की पतली लकीर ऐसे लग रही थी जैसे बेबी पिंक कलर पर सिल्वर कलर की कोटिंग की गयी हो। शायद मेरी नज़रों की तपिश थी या उसकी छठी हिस का कमाल, उसने मेरी तरफ़ देखते हुए भवें उचकाते हुए देखा मानो पूछ रही हो कि 'क्या है?'
- 'आपके नाख़ून...', मैंने झेंपते हुए कहा।
- 'वेल शेप्ड एंड वेल फाईल्ड हैं और बढ़े हुए भी नहीं हैं जो आपको डर लगे। वैसे भी नाख़ून हैं कोई हथियार नहीं।' उसके जवाब में मैं बस मुस्कुरा के रह गया। उसकी बातूनी तबियत ने ये बताने की मोहलत ही नहीं दी की मुझे उसके नेल पॉलिश के कलर और शेड्स अच्छे लगे।
- 'कहाँ तक जाना है?' कश्मीरी गेट पर भीड़ के उतरने के बाद उसने पूछा।
- 'G.T.B नगर और आप?' बाएँ कान से हेडफ़ोन का ईयर पीस निकालते हुए मैंने कहा।
- 'मैं भी वहीँ तक' कहते हुए उसने अगला सवाल दाग दिया, 'Civil Aspirant?'
- 'और मैंने हाँ में सर हिला दिया जबकि मैं सिविल की तैयारी भी नहीं कर रहा था। हाँ, फ़र्स्ट एटेम्पट में प्री नहीं निकाल पाने के बाद ये चाहत थी कि एक बार तैयारी कर के सेकंड एटेम्पट दूँ पर तैयारी नहीं कर पाया। आज उसके इस सवाल ने उस कसक की टीस को फिर से ज़िंदा कर दिया था।
- 'व्हिच एटेम्पट?' उसके इस सवाल पर मैं वापस होश में आया तो इस बार सच बोला 'सेकंड।'
G.T.B. स्टेशन पर उतर हम ख़ामोशी से बाहर आये। उसने रिक्शा रोक कर उसपे बैठते हुए पूछा कहाँ?
- 'गाँधी विहार', मेट्रो कार्ड जेब में रखते हुए मैंने कहा।
- 'शेयरिंग?'
- मेरे 'श्योर' कहते ही वो दाएँ तरफ़ खिसक गयी मेरे बैठते ही रिक्शा चल पड़ा और उसका सवाल भी। सो, 'in which coaching you are?'
- 'Vajirao and Ravi', मुझे एक और झूठ बोलना पड़ा।
- 'तभी शौपिंग्स हो रही है, मुस्कुराते हुए उसने कहा। By the way, I am in Chanakya IAS Academy'
- 'योर सब्जेक्ट्स?' मैंने पूछा।
- 'पब्लिक ऐड. एंड जियोग्राफी', एंड योर्स?
- 'हिस्ट्री एंड पोल. साइंस' मैंने एक और झूठ गढ़ा'
बस यहीं...यहीं ! उसने रिक्शे वाले को रोकते हुए कहा। 'मेरा हॉस्टल आ गया', D-329 के सामने रिक्शा रुकते हुए उसने कहा और बीस रुपये का नोट मुझे पकड़ाते हुए गुड़ नाईट कहती चली गयी और रिक्शा आगे बढ़ने लगा तभी जाते-जाते उसने मुड़ कर कहा, by the way, 'I am Ananya Bharadwaj'. शुक्र है तब तक रिक्शा रफ़्तार पकड़ चुका था और उसने मेरा नाम नहीं पूछा वरना मुझे एक और झूठ गढ़ना पड़ता। रिक्शा आगे बढ़ते ही मन में ये ख़याल उभरा कि 'क्या मैं फिर से सिविल सर्विसेज़ की तैयारी करूँ?' और दिल ने जब ढंग का कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने हेडफ़ोन जब दुबारा कानों में लगाया तो उसपर 'तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं' बज रहा था। शायद मुझे मेरा जवाब मिल गया था।
~
- नैय्यर / 28-08-2015

फोन कॉल, चिप्स, कॉफ़ी ई.टी.सी.

- 'तो लोग पहुँच गए?' मेरे गला साफ़ करने वाली स्टाइल की नक़ल उतारने के बाद उसने सलाम करने के बाद खिलखिलाते हुए पूछा।
- 'कौन से लोग, मैं तो अकेला ही हूँ?' मैंने सलाम का जवाब देते हुए अनजान बनते हुए बेपरवाह अंदाज़ में कहा।
- 'पर उससे मिलने के बाद तो लोग दो हो गए हैं न?' सब ख़बर है मुझे वैसे, पर उसे कुछ पता नहीं कि लड़का कहाँ-कहाँ घूम रहा है?
- 'किसे?' मैंने अनजान बनते हुए पूछा जिसके जवाब में उसने कहा कि 'अरे वही आपकी...'
- 'पर वो तो फ़ेसबुक पर मुझसे जुड़ी ही नहीं है तो उसे कैसे ख़बर होगी मेरे आवारागर्दी के हरकतों की', उसका इशारा समझते ही मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
- 'आए-हाय! क्या बात है, उसका ज़िक्र आते ही लोग मुस्कुराने लगे।
- और क्या, वो है ही इस क़ाबिल। वैसे उसे मेरी हरकतों से आगाह रखो, मैं अच्छा लड़का हूँ कहीं उसके हाथ से निकल न जाऊँ? मैंने शरारत से कहा।
- 'और बताएँ'
- 'वापस कमरे पर जा रहा था की कॉल आया कि आपको मुझसे बात करनी है, सो मैं ख़बर मिलते ही आ गया आपसे बतियाने।'
- 'रहने दें, रहने दें! मिलने गए हैं किसी और से और बहाना मेरा। बातें बनाना कोई आपसे सीखे।'
- 'बात नहीं बना रहा मैं, सच कह रहा हूँ।' वैसे तुम इनबॉक्स में तो बहुत हड़काते रहती हो मुझे और फोन पर तो आवाज़ बिलकुल बच्चों जैसी है।
- 'हाय...! अरे इस लड़की ने मेरे भौकाल का फ़ालूदा निकाल दिया।' उसकी इस बात पर हम दोनों के ज़ोरदार कहकहे उबाल पड़े। हँसी रुकते ही उसने पूछा, वैसे है कहाँ ये लड़की?'
- 'कॉफ़ी बना रहा ही मेरे लिए' मोबाइल पर मैसेज चेक करते हुए कहा मैंने।
- 'मुझे फ़ोटो भेज दीजियेगा कॉफ़ी का'
- 'क्यूँ, कॉफ़ी का फ़ोटो किसलिए? मैंने हैरत से पूछा।
- 'मुझे देखनी है कि उसने आपके लिए कैसी कॉफ़ी बनाई है?'
- 'एक ही इंसान दो तरह की भी कॉफ़ी बनाता है क्या?'
- 'अरे वो बहुत घुन्नी है, दो लोगों के लिए दो तरह की कॉफ़ी बना सकती है। उसकी शकल पर मत जाइये। वैसे आज इतने दिनों बाद बात हो ही गयी अपनी, है न?' मुस्कुराते हुए उसने कहा।
- 'हाँ! हो तो गयी, पर दोस्ती की जड़ से बतियाना अभी तो बाक़ी ही है। ये तो डाली है।'
-'राइटर से बतियाने का यही फ़ायदा है, बात को कितनी ख़ूबसूरती से मोड़ देते हैं न?
- 'कौन राइटर, कहाँ का राइटर?
- 'आप, दिल्ली घूमने वाले राइटर।'
- 'इसलिए लोग ख़ुद से बतियाने से डरते हैं, आज बात भी कर रहे हैं तो दूसरे की वजह से।'
- 'आप बार-बार इससे मिलने आते रहा करिये मैं बतियाते रहा करुँगी आपसे।'
- 'ख़ुद फ़ोन करना तब बतियाना, अभी दूसरे का पैसा काट रहा है, वैसे भी हम बहुत देर से गपिया रहे हैं।'
- 'अरे आप उसके बैलेंस का टेंशन न लो, बहुत अमीर है वो। अच्छा, चलिए जब अगली बार आएँगे आप तब फिर बात करेंगे, इसी वादे के साथ हम दोनों ने एक दूसरे को ख़ुदा हाफ़िज़ कहा और कॉल डिसकनेक्ट कर दिया।'
-'क्या हुआ, फिर लड़ाई हो गयी क्या?' जब वो कॉफ़ी लिए आई तो मुझे चुप देख कर बेसाख़्ता पूछ बैठी।
- 'नहीं, लड़ाई नहीं हुई, बात ख़त्म हो गयी।'
- 'आप दोनों इतना लड़ते हैं न कि आप दोनों की चुप्पी से यही डर लगता है कि कहीं फिर तो नहीं लड़ बैठे।'
- 'हमारी दोस्ती ही ऐसी है।' और फिर हमदोनों कॉफ़ी और चिप्स से इंसाफ़ करते हुए कितनी देर बतियाते रहे पता ही नहीं चला। अचानक घडी पर नज़र पड़ी तो उसने चुपके से डेढ़ घंटे गुज़र जाने का एहसास दिलाया। कुछ देर और बात करने के बाद हम दोनों एक दूसरे को अलविदा कहते हुए अपने-अपने राह लगे।
~
- नैय्यर / 19-08-2015

Friday, 14 August 2015

सरहद

लाहौर के डिफ़ेन्स एरिया में 250 एकड़ में फैले ‘ख़ान विला’ ने अभी ढंग से सुबह का इस्तक़बाल भी नहीं किया था कि क़यामत ने दस्तक दे दी थी. वो फज्र की नमाज़ के बाद मौलाना आज़ाद की लिखी क़ुरान की तफ़सीर लेने लाइब्रेरी गयी. चूँकि क़ुरान की तफ़सीर पढ़ना उसका रोज़ का मामूल था इसलिए उसने बिना बत्ती जलाए ही लाइब्रेरी के पश्चिमी सिरे पर रखी किताबें टटोलनी शुरू कर दी. लाइब्रेरी का पश्चिमी सिरा अरबी के किताबों और लिटरेचरों से अटा पड़ा था. दाएँ से चौथे नम्बर पर उसकी मतलूबा किताब रखी रहती थी. उसने जैसे ही किताब रैक से खींची, कोई सामान गिरा. लगभग दो हाथ के फ़ासले पर बिजली का स्विच था, उसने एक क़दम दाएँ बढ़ते हुए बिजली का स्विच ऑन किया तो देखा कि लाल रंग के कपड़े से बंधी एक पोटली गिरी हुई थी और राख सफ़ेद संगमरमर के फ़र्श पर बिखर पड़ी थी. वो किताब हाथ में थामे हैरान खड़ी राख, पोटली और लाल कपड़े के बीच की गुत्थी को सुलझाने की नाकाम कोशिश कर ही रही थी कि बग़ल उसके दादा के आवाज़ उसके कानों पे पड़ी.
‘क्या गिराया महीन?’
‘कुछ नहीं दादू ! पता नहीं, कैसी पोटली गिरी है, जिससे फ़र्श पर राख बिखर गयी है’
‘क्...क्क...क्या? पोटली...पर वो गिरी कैसे? मैंने तो सबसे ऊपर वाले रैक में रखा था.’
‘मुझे नहीं पता दादू, पर...ये पोटली है कैसी? और इसमें राख क्यूँ रखी है आपने?
‘ठहरो मैं आता हूँ वहाँ’
‘आप रहने दें दादू, मैं अभी साफ़ कर देती हूँ’
‘नहीं ! उसे वैसे ही रहने दो...मैं आ रहा हूँ, वो मेरा बोझ है और मुझे ख़ुद ही उठाना है अपना बोझ’
‘रिटायर्ड प्रोफ़ेसर एहसान ख़ान महोगनी की स्टिक के सहारे चलते हुए लाइब्रेरी आए और चुटकी भर राख सुरमे की तरह आँखों में लगाया ही था कि रो पड़े.
‘दादू, आप रोने क्यूँ लगे? और ये राख आपने आँखों में क्यूँ लगा ली? लाइए मैं अपने दुपट्टे से इसे साफ़...’
‘ये राख नहीं है बेटा. ये मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी कमाई है, ये पिछले 68 सालों की अमानत है. ये सरहद पार आने का इनाम है बेटा’
‘68 सालों की अमानत? सरहद पार आने का इनाम? मैं कुछ समझी नहीं दादू?’
‘पहले अपने पापा को बुलाओ, मुझे भी उस से अपनी अमानत से ख़यानत का हिसाब लेना है’
‘जी अब्बा ! आपने मुझे बुलाया?’
‘महीन के साथ मेजर ज़ीशान ख़ान ने लाइब्रेरी में क़दम रखते ही बहुत इज़्ज़त से अपने वालिद एहसान ख़ान से पूछा’
‘गिरी हुई पोटली की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने पूछा, - इसे तुमने हटाया था?’
‘लेकिन ये गिरी कैसे?’
‘पहले मेरे सवाल का जवाब दो’
‘जी, मैंने हटाया था’
‘क्यूँ?’
‘क्यूँ का जवाब तो आपको भी पता है अब्बा, आज 14 अगस्त है और आज ही के दिन...’
‘हाँ, मुझे पता है आज ही के दिन मैंने....’
‘अब जाओ तुम दोनों, जो बोझ मैंने आज से 68 साल पहले मैंने उतारा था उसे जब तक मैं ज़िन्दा हूँ मुझे ख़ुद ही उठाना होगा’, आँसुओं के सैलाब से भरी आँखों से साथ उन्होंने कहा.
‘ये सब क्या है पापा? दादू ने उस राख को अपनी आँखों में क्यूँ लगाया? वो उस राख के लिए रो क्यूँ रहे हैं पापा? ख़ामोशी से कॉरिडोर से गुज़रते ज़ीशान ख़ान को उसने झंझोड़ते हुए फिर पूछा, - कुछ तो बोलिए पापा, आप इतने चुप से क्यूँ हो गए पापा?
‘तुम ये सारे सवाल अपने दादू से पूछना क्यूँकी सवाल उन्हीं से जुड़े हुए हैं’
‘अगर सारे सवाल दादू से ही जुड़े हुए हैं तो आपने उस पोटली को क्यूँ हटाया? वो कौन सा सवाल है जो पोटली के हटाने और आपकी ख़ामोशी के बीच रुकावट है, बोलिए न पापा?
‘मुझे देर हो रही है, तुम मेरी वर्दी निकाल दो, मुझे फ्लैग होस्टिंग के लिए निकलना है, कहीं देर न हो जाए.’ और हाँ, अपने दादू को नाश्ता करा देना, उन्हें ज़्यादा तंग न करना.
***
मेजर ज़ीशान ख़ान के आर्मी यूनिफ़ार्म में तैयार हो कर फ्लैग होस्टिंग के लिए निकलने के बाद माहीन दादू के पसंदीदा नाश्ते चाय और नमकीन पराठे लिए उनके कमरे में पहुँची मगर वो वहाँ नहीं थे. नाश्ते की ट्रे मेज़ पर रख कर वो लॉन में उन्हें ढूंढने चली आई, मगर सनोबर के दरख़्त के पास रहने वाली उनकी सफ़ेद कुर्सी ख़ाली पड़ी थी. कहाँ गए दादू? ख़ुद से ही सवाल पूछने और उसे हल करने की कोशिश में उसे ध्यान आया कि कहीं वो पास के आर्मी स्कूल में फ्लैग होस्टिंग देखने तो नहीं चले गए? लेकिन तभी उसे ख़याल आया कि दादू तो बताये कहीं नहीं जाते, फिर आज कहाँ चले गए? और इस बार वो मन के जवाब पर तेज़ी से लाइब्रेरी की तरफ़ भागी थी. देखा तो दादू वहीँ लाइब्रेरी की फ़र्श पर बैठे ज़ार-व-क़तार रो रहे थे और अपने कुर्ते के दामन से संगमरमर के बेहिस पड़े सीने पर से बिखरी हुई राख समेट रहे थे.
‘आप यहाँ हैं, मैं आपको सारे घर में खोजती फिर रही हूँ, लॉन तक में देख आई आपको. आज आपने नाश्ता नहीं करना?’
‘जिस गले में आँसुओं के गोले अटके हों न तो उस गले से निवाले नहीं निगले जाते’
‘लेकिन आप रोये क्यूँ जा रहे हैं? कुछ तो बताएँ न दादू?’
‘अब मुझमें इतनी ताक़त नहीं कि मैं पुश्त-दर-पुश्त अपनी कमज़र्फ़ी का ऐतराफ़ करता रहूँ. मैं अपना बोझ उठाते-उठाते मैं बहुत थक गया हूँ बेटा’
‘कैसा बोझ दादू? बोलें न?
‘अपने पापा से पूछना.’
‘पापा से पूछा तो उन्होंने कहा कि आप से पूछूँ, और आप से पूछने पर आप कह रहे हैं कि अपने पापा से पूछना.’ जाएँ, मुझे नहीं पूछना किसी से, काश मेरी मम्मा इतनी जल्दी ख़ुदा के पास मेरी शिकायतें करने नहीं गयी होतीं तो मैं उन्हीं से पूछती. वो बहुत अच्छी थी, मेरे हर सवाल का जवाब देती थीं. मैं ही बुरी हूँ इसीलिए तो मम्मा भी मुझे छोड़ कर चले गए, पापा भी कुछ नहीं बताते और आप भी कुछ नहीं बता रहे.’
‘नहीं...मेरी बेटी तो बहुत प्यारी और समझदार है’
‘इसलिए मुझसे कोई कुछ भी शेयर नहीं करता’
‘दादू आपके साथ सबकुछ शेयर करेंगे, पर...एक शर्त है?’ – उन्होंने पोटली को लाल रंग के कपड़े से बाँध कर अपने आँसू पोंछते हुए कहा.
‘मुझे मंज़ूर है’
‘पहले हम दोनों साथ में नाश्ता करेंगे फिर...’
‘ओके, डन ! आप चलें अपने कमरे में, मैं दूसरा नाश्ता ले कर आती हूँ. वो तो कबका ठंडा हो चूका होगा.
***
हाँ, अब बताएँ.’ – नाश्ते के बर्तन किचन में रख वापस आकर उसने कहा.
हम राजपूत हैं वो भी जंजुआ और जंजुआ राजपूतों का इतिहास गवाह रहा है - वफ़ादारी, इमानदारी और इज़्ज़त के लिए ख़ुद को अपने ख़ानदान को क़ुर्बान कर देना. हमारे बाप-दादाओं ने कई राजाओं के फ़ौज की कमान संभाली है. हमारी नई नस्ल तलवार के साए में पैदा होती रही और पुरानी तलवार के साए में ही दम तोड़ती रही. हमने कभी जंग के मैदान में पीठ नहीं दिखाई. अना और बग़ावत को हमने तलवार की नोक से चीर कर अपनी शमसीर पर फ़तह की तारीख़ लिखी है. हमारे बाप-दादाओं की बहादुरी की चर्चे बादशाह सिकंदर लोधी के कानों तक भी पहुँची और सन 1501 में धौलपुर स्टेट फ़तह के साथ ही हमारे ख़ानदान के क़दम आज के हिन्दुस्तान में पड़े.
‘तो क्या हम बँटवारे के बाद हिन्दुस्तान से भाग कर पकिस्तान आये थे?’
जब हमारा ख़ानदान आज के हिन्दुतान में आया तब पाकिस्तान का वजूद ही नहीं था. तब सिर्फ़ हिन्दुस्तान था, राजा-रजवाड़ों का हिन्दुस्तान, भोले-भाले मासूम लोगों का देश हिन्दुस्तान. हमारा ख़ानदान स्यालकोट का है जो बँटवारे के बाद पाकिस्तान के हिस्से में आ गया. लगभग 26 सालों तक हमारे बाप-दादा सिकंदर लोधी के लिए लड़ते रहे और फिर सन 1527 में धौलपुर को बाबर ने जीत लिया. हारे हुए राजा के सैनिक क़ैद कर लिए गए और उनमें से चन्द बेहतरीन सैनिकों को मुग़ल सेना के साथ वफ़ादारी निभाने की क़समों के साथ फ़ौज में भर्ती कर लिया गया. इस तरह तरह हम सन 1527 से 1857 तक मुग़ल फ़ौज और मुग़ल शहंशाहों के वफ़ादार बने रहे. इस बीच हमारे ख़ानदान ने शहजादा ख़ुर्रम का वो बग़ावती तेवर भी देखा जब उन्होंने सम्राट जहाँगीर के ख़िलाफ़ दिल्ली के तख़्त के लिए तलवार उठाया. तब हमने दोनों ख़ेमों के लिए ख़ून बहाई थी. शहजादा ख़ुर्रम ने धौलपुर पर क़ब्ज़ा जमाने के बाद फ़तेहपुर सीकरी पर हमला किया और आसानी से जीत हासिल कर अकबराबाद (आज का आगरा) के लाल क़िला पर धावा बोला मगर जीत नहीं सके. अपनी फ़ौज वापस मोड़ बुरहानपुर में पनाह ली. इतिहास ने फिर करवट ली और जब शहजादा ख़ुर्रम बादशाह बन कर शाहजहाँ के नाम से तख़्त पर बैठे तब उनके बेटों ने उनके ख़िलाफ़ भी बग़ावत बुलंद की. औरंगज़ेब नहीं चाहते थे कि दारा शिकोह को धौलपुर क़िले पर फ़तह नसीब हो. उस बार भी दोनों ख़ेमों के परचम को हमने अपने वफ़ादारी से रंग डाला.
सन 1761 में धौलपुर पर मुग़लों की पकड़ कमज़ोर हुई और फ़ायदा उठाया राजा कल्याण सिंह भदौरिया ने. उसके बाद जाट महाराजा सूरजमल ने सन 1775 में इसपर क़ब्ज़ा जमाया फिर सिंधिया राजघराने ने सन 1782 में और आख़िर में अग्रेज़ों ने सन 1803 में. हमारे बाप-दादा ने सन 1761 में धौलपुर से मुग़ल राज ख़तम होते ही धौलपुर छोड़ दिया. शहजादा ख़ुर्रम की फ़ौज की तरफ़ से फ़तेहपुर सीकरी जीतने में मदद करने के एवज़ में उनके बादशाह बनते ही हमें भरतपुर में जागीर मिल गयी. कई पुश्तें भरतपुर में पैदा हुईं और कई वहीँ मर-खप गयीं. दिल्ली में सन 57 के ग़दर के कमान संभाली आख़िरी मुग़ल शहंशाह बहादुर शाह ज़फर ने. मेरे दादा ने सन 1857 में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आख़िरी बार मुग़ल शहंशाह बहादुर शाह ज़फर के लिए तलवार उठाई.  ज़बरदस्त मार-काट मची थी, अपनों की मुख़बरी और अंग्रेज़ों की भारी फ़ौज के सामने कमज़ोर पड़ चुकी मुग़ल सेना कबतक लड़ती. हार यक़ीनन थी और हुई भी. शहंशाह हुमायूँ के मक़बरे से गिरफ़्तार हुए और फिर शुरू हुआ कभी न रुकने वाला फाँसियों का सिलसिला. ख़ूनी दरवाज़े पर मेरे दादा को फाँसी दे दी गयी. लाश कई दिनों तक झूलती रही, किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि लाश उतार कर कफ़न और जनाज़े के बारे में सोचे.
***
मेरे अब्बा भरतपुर से दिल्ली आ गए. मैं दिल्ली में ही पैदा हुआ और वहीँ जवान हुआ. वो ख़ुद गुप-चुप तरीक़े से आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गए और मैं दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में पढ़ने लगा. आख़िरी साल में था तब जाने कैसे कॉलेज के अंग्रेज़ प्रिंसिपल को इस बात की भनक लग गई कि मैं दिलावर ख़ान का बेटा हूँ, जो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ साजिश करता है, नज्में लिखता है और लोगों को अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भड़काता है. प्रिंसिपल ने वादा किया कि अगर मैं अपने अब्बा को पकड़वा दूँ या उनका पता बता दूँ तो मैं इस कॉलेज में आगे भी पढ़ सकता गुण, अंग्रेज़ी सरकार को कोई ऐतराज़ नहीं होगा. किस बेटे को ये गवारा होगा कि उसका बाप उसकी वजह से जेल जाए. मैंने इंकार कर दिया जिसके बदले में मुझे कॉलेज से निकाल दिया गया. उन्हीं दिनों अमृतसर में ख़ालसा कॉलेज की बुनियाद रखने की चर्चा ज़ोरों पर थी. दो साल मैं दिल्ली में पड़ा रहा पर पढ़ने को दिल नहीं चाहा, अब्बा ने भी ज़ोर नहीं दिया. एक दिन मैं जब हॉकी खेलने लिए तैयार निकला तो उन्होंने पकड़ लिया.
‘ऐसा कबतक चलेगा?’
‘क्या? – मैंने हॉकी स्टिक से अपनी पिंडली थपथपाते हुए कहा.
‘यूँ मारे-मारे कबतक फिरोगे?’
‘क्या करूँ? अंग्रेज़ी सरकार में तो नौकरी मिलना भी मुश्किल है.’
‘सिर्फ़ B. A. के भरोसे नौकरी मिल भी तो नहीं सकती, तुम आगे पढ़ाई क्यूँ नहीं करते?’
‘कॉलेज से तो निकाल दिया गया, अब किस कॉलेज में जाउँ पढ़ने?
‘तुम अमृतसर क्यूँ नहीं चले जाते?
‘ख़ालसा कॉलेज, अमृतसर...’
‘हाँ’
‘अच्छा, सोच के बताऊँगा आपको’
मेरे सोचने और बताने से पहले ही उन्होंने मुझे अमृतसर भेजने का फ़ैसला कर लिया था. जब हॉकी खेल कर वापस आया तो एक ख़त देते हुए कहा कि - ‘मैंने तुम्हारे और अपने हवाले से तमाम बातें लिख दी हैं, वहाँ तुम्हारा नाम भी लिख जाएगा और कोई परेशानी भी नहीं होगी, रहने-खाने का भी इंतज़ाम हो जायेगा.’
‘रहने-खाने का, पर कहाँ, किसके पास?’
‘प्रोफ़ेसर रयान थॉमस के घर’
‘अंग्रेज़ के घर?’
‘वो मेरा दोस्त है, बाक़ियों की तरह नहीं है, भला आदमी है.’
‘अंग्रेज़ और भला’ – मैंने नफ़रत से कहा
‘अच्छा, पहले मिल तो लो, अच्छा न लगे तो मत रहना उसके वहाँ, बाक़ी तुम्हारी मर्ज़ी. तुम अपने फ़ैसले करने के लिए आज़ाद हो.’
तैयारी तो क्या करनी थी, ख़ुद को समझाने में ज़रा वक़्त लगा. हफ़्ते भर सोचने के बाद मैंने अपना सामान बाँध लिया. अमृतसर पहुँच कर एक धर्मशाला देखा और वहीँ डेरा-डंडा डाल लिया. 2-3 दिन इधर-उधर घूमता रहा और फिर एक दिन ख़त ले कर ख़ालसा कॉलेज में प्रोफ़ेसर रयान थॉमस के पास पहुँच गया. उन्होंने ख़त की तारीख़ देखी और फिर मुझे. थोड़ी देर बाद मेरी तरफ़ देखा और पूछा,
‘एम. ए क्यूँ करना चाहते हो?’
मैंने कहा, - अब्बा ने कहा है?
एक बारीक सी मुस्कराहट उनके होंठों पर रेंग गयी.
फिर पूछा, - ‘किस सब्जेक्ट में?’
मुझे पसंद तो इंग्लिश था और मैं चाहता भी वही था पर इतिहास कह दिया और कहा भी इसलिए कि फ़ेल हो गया तो पढ़ाई और अंग्रेज़ों से पीछा छुटे.
‘ठीक है, कल सुबह आ जाना तुम्हारा एडमिशन हो जाएगा. और अभी तक कहाँ थे तुम? तुम्हारा सामान....?’
‘वो तो धर्मशाला में है.’
‘क्यूँ? तुम्हारे अब्बा ने तो ख़त में तुम्हें मेरे साथ रहने को लिखा है.’
‘हाँ, लिखा तो है पर...मुझे अंग्रेज़ पसंद नहीं.’
मेरे जवाब पर उनका गोरा रंग मांड पड़ गया, एक चुप्प से लग गयी उन्हें. मुझे वहाँ खड़ा देखकर उन्होंने सर के इशारे से मुझे जाने को कहा. अगली सुबह मैं कॉलेज गया और मेरा एडमिशन हो गया. मैं पढ़ाई के साथ आज़ादी की सरगर्मियों में भी हिस्सा लेने लगा. देखते-देखते कब दो साल बीत गए पता ही नहीं चला. बस इतना पता चला कि मैं इतिहास लेकर भी फ़ेल नहीं हुआ और प्रोफ़ेसर रयान थॉमस बिलकुल भी वैसे नहीं थे जैसा मैं सोचता था. वो मेरी सोचों से कहीं ज़्यादा अच्छे इंसान थे, मेरे दोस्त और हमदर्द थे.
***
फ़र्स्ट क्लास फ़र्स्ट एम. ए पास करते ही मुझे कॉलेज में ही पढ़ाने का मौक़ा मिल गया. ये प्रोफ़ेसर रयान थॉमस की एक और मेहरबानी थी मुझपर. उनदिनों अपने-अपने सब्जेक्ट्स के टॉपर को अमूमन पढ़ाने का न्योता मिल जाया करता था. नौकरी लगी और अब अब्बा ने मेरी शादी कर दी. ख़ुदा ने मुझे 2 बेटी और तीन बेटों ने नवाज़ा. तुम्हारा बाप सबसे छोटा है. उसकी पैदाइश के 3-4 सालों के बाद ही तुम्हारी दादी इस दुनिया से कूच कर गयीं. इसी बीच आज़ादी की लड़ाई ने बहुत ज़ोर पकड़ लिया था.  लाला लाजपत राय की मौत और भगत सिंह की फाँसी ने नौजवानों को पागल कर दिया था. हर रोज़ एक नयी तंजीम बनती और अंग्रेज़ों की नींद हराम कर देती. गोलमेज़ कांफ्रेंस ने अलग हंगामा किया हुआ था. मुस्लिम लीग और कांग्रेस लीडरों के आपसी ताफ़रक़े ने देश के बँटवारे कि नींव रख दी थी. सन 42 का भारत छोड़ो आन्दोलन बहुत कामयाब गुज़रा था और देशभर में अब ये चर्चा आम हो चली थी कि अंग्रेज़ अब गए कि तब गए.
कुछ दिनों से उमस बहुत बढ़ गयी थी. मैं कॉलेज से रिटायर हो चूका था और कभी-कभार प्रोफ़ेसर रयान थॉमस से मिलने उनकी कोठी पर पहुँच जाता था. उस दिन सुबह-सुबह हलकी बूंदा-बांदी हो रही थी. मैं छाता लिए पैदल ही प्रोफ़ेसर रयान थॉमस के घर की तरफ़ चल पड़ा. लाल ईंटों वाली उनकी कोठी दूर से ही दिख जाती थी. कॉले खम्भे पर तरतीब से ऊपर की तरफ़ चढ़े बोगनबलिया पर हलके गुलाबी और सरसों के रंग के फूल खिले थे. दुसरे खम्भे से मनी प्लांट और चमेली की डालियाँ ऊपर को चली गयीं थी, चमेली की डालियों पर भी सफ़ेद फूलों की बहार थी. प्रोफ़ेसर रयान थॉमस लॉन में केन की कुर्सी पर उदास बैठे थे. इतने उदास कि उन्हें मेरे आने का एहसास तक नहीं हुआ. क्या हुआ? आज इतने उदास क्यूँ हैं? मुझे देख उनकी बूढी आँखों में थोड़ी चमक आई और बुझ गयी. अल्मांडा के पीले फूल से भी ज़्यादा पीला हो रहा था उनका चेहरा. मैंने फिर पूछा, क्या हुआ? कोई परेशानी?
‘माउंटबेटन ने इस देश के बँटवारे की तजवीज़ को क़बूल कर लिया है. जैसे 1905 में बंगाल के नक्शे पर एक लकीर ने लोगों के दिलों को बाँट दिया था वैसा ही इस बार भी होगा. रेडक्लिफ़ को पंजाब के नक्शे और मुसलमान इलाक़े को बाक़ी के भारत से अलग करने का ज़िम्मा सौंपा गया है.’
‘लार्ड माउंटबेटन ने?’ – मैंने हैरत से कहा
‘उसे लार्ड मत कहो एहसान, वो सभ्य समाज का एक शातिर हत्यारा होगा. मेरी ये बात याद रखना.’
प्रोफ़ेसर रयान थॉमस की बात सच साबित हुई. बँटवारे के दस्तावेज पर दस्तख़त होने से पहले ही दंगों की आहट थी और कई जगहों पर हुई भी थी. दस्तख़त ने मानो दंगों को मंज़ूरी दे दी. दंगों पाँच लाख लोगों का मारा जाना इस बात का सबूत है कि इसकी तैयारी पहले से थी और जम की थी. सन 47 में ब्रिटिश इंडिया से दो देश उगे. भारत और पकिस्तान. पकिस्तान की तरह भारत टुकड़ों में नहीं बंटा. ईस्ट और वेस्ट पाकिस्तान की सरहर्दों पर जम कर ख़ून-ख़राबा हुआ और सांप्रदायिक दंगे दोनों दिशाओं की सरहदों पर हुए. बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमान पूर्वी पाकिस्तान में पनाह की ग़र्ज़ से भागे जो 1905 के बंगाल विभाजन के बाद और और बदहाल और कंगाल हो चूका था. पश्चिमी उत्तरप्रदेश, कश्मीर और पंजाब के मुसलमान पश्चिमी पाकिस्तान में पनाह की ग़र्ज़ से भागे और पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान से सिख और हिन्दू हिंदुस्तान की ओर. साउथ इंडिया के मुसलमान दंगों से ज़्यादा बर्बाद नहीं हुए पर सन् 48 के ऑपरेशन पोलो में अकेले हैदराबाद में ढाई लाख मुसलमानों का क़त्ल हुआ. सेंट्रल इंडियाके मुसलमान भी दिल्ली के रास्ते पकिस्तान के लिए चल पड़े, पर कितने लोग सरहद पार कर पाये?
गढ़मुक्तेश्वर के रास्ते दिल्ली को जाने वाले लाखों मुसलमान कभी दिल्ली नहीं पहुँच पाये, पश्चिमी पाकिस्तान क्या पहुँचते? लाखों लाशें नहर में तैरती मिलीं. वैसे ही बंगाल और बिहार के लाखों मुसलमान पूर्वी पाकिस्तान पहुँचने से पहले मौत के घाट उतार दिए गए. नोअखोली में लाखों हिन्दुओं को मुसलमानों ने मारा. दंगों में सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं मरे. कई बार मुसलमान के धोके में ईसाई भी मारे गए. रावलपिंडी के दंगों में लाखों हिन्दू और सैकड़ों सिख भी मारे गए. वो जगहें गिनती की हैं जहाँ मुसलमानों ने हिन्दू और सिखों को मारा मगर वो अनगिनत जगहें इतिहास से नदारद हैं जहाँ हिन्दू और सिखों ने मुसलमानों को मारा. कहीं मरने वाले मुसलमान थे तो मारने वाले हिन्दू और सिख तो कहीं हिन्दू और सिख मरने वालों में थे और मारने वाले मुसलमान थे मगर हर जगह मरी सिर्फ़ इंसानियत और मिली सिर्फ़ लाशें. मासूम बच्चियों की इज़्ज़तें उनके भाई और बाप के उम्र के लड़कों ने लूटी . औरतों को घरों से निकाल कर सरे आम उनकी इज़्ज़त उनके बेटे और भाई के उम्र के लड़कों ने लूटी. बूढों तक ने उनपे रहम न किया.
‘दादू ये सब तो मैंने दर्जनों किताबों में पढ़ी है पर इन सबका आपके रोने और उस राख वाली पोटली से क्या रिश्ता है? मुझे तो अबतक समझ नहीं आया.
***
जब दंगे अपनी शबाब पर थे तब हम अपनी जागीर गुरदासपुर में थे. पहले ये पाया गाया था कि ये हिस्सा पाकिस्तान को दे दिया जाएगा लेकिन ऐन वक़्त पर ये हिन्दुस्तान के हिस्से में आ गया और फिर शुरू हुआ हैवानियत का नंगा नाच. झुण्ड के झुड सरदार आते घरों से बहु, बेटियों बीवियों को उठा कर ले जाते और उनकी इज़्ज़तें तार-तार कर देते. गोल-गोल हिन्दू और सिख आते और मिनटों में दर्जनों आदमी के सर उनके तन से जुदा कर दिए जाते. मैं चूँकि कॉलेज में पढ़ा चूका था इसलिए आस-पास के लोग मेरी इज़्ज़त करते थे. अबतक हमारे घारों पर किसी ने धावा नहीं बोला था ना ही किसी ने बुरी नज़र से देखा था. रोज़ रात में नीम के बड़े से पेड़ के नीचे चौपाल जमती और मौत पर नंगी हँसी से चौपाल शरमा जाता. ऐसे ही एक दिन सुखविंदर और त्रिलोचन चौपाल पर लाशों की गिनती और अपनी कमीनी हरकतों पर दाद वसूल रहे थे जब मैंने उन्हें टोक दिया कि मज़हब के नाम पर लोगों को क़त्ल करते हुए तुमलोगों को शर्म नहीं आती? उन्होंने पलट कर जवाब दिया, - आप हमारे गाँव के हो इसलिए अभी तक सही-सलामत बचे हो, कहीं ऐसा न हो कि हम किसी दिन गुरदासपुर लूटने में लगे हों और कोई और जत्था आपकी बेटियों को लूट ले. अगर सलामती चाहते हो तो रातों-रात सरहद पार जाओ. वरना हम कब तक तुम्हारी रखवाली करेंगे. किसी दिन हमारी भी नियत.....’
इसके आगे सुनने की न मुझे ज़रुरत थी न मैंने कोशिश की. इंसान को हैवान बनते देर नहीं लगती. उनकी बातों से मेरी रीढ़ की हड्डी तक में सिहरन उतर गयी मगर वो बेशर्मी से हँसते रहे और नीम की लड़की से दाँत खोदते रहे. मैं वहाँ से भारी मन से उठा और सोने के लिए लेट गया, मगर नींद आँखों से कोसों दूर थी. ऐसे हालात में भला नींद किसे आती? जो कल तक मुहाफ़िज़ थे वो आज भेड़िये बन हैं. और भेड़ियों को सिर्फ़ गोश्त का लोथड़ा दीखता है चाहे वो किसी का भी हो. जब हैवानियत पर उतर आयेंगे तब वो ये न सोचेंगे कि मेरी बेटियाँ उनकी भी कुछ लगती हैं. वो उन्हें भी भभोड़ देंगे. जिन्हें मैं ता-उम्र इंसानियत का सबक़ डेटा रहा वो एक पल में हैवान बन गए. सिर्फ़ धर्म के नाम पर बदला लेने के लिए.
सारी रात मैं जागता रहा और सुलगता रहा. सुबह अपने तीनों बच्चों से मशवरा किया कि क्या हमें सरहद पार चलना चाहिए. जिस ज़मीन को हमने लगभग साढ़ेचार सौ सालों तक ख़ून से सींचा था उसे छोड़ने पर कोई रज़ामंद नहीं दिखा. मगर मैं अपने फैसले पर अडिग था. ये फ़ैसला एक मुसलमान की नज़र से नहीं एक बाप की हैसियत से किया था मैंने. मैं ये कैसे देख सकता था कि मेरी बेटियों की इज़्ज़त मेरे सामने लुट जाए. मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं उनके बिखरे वजूद की किरचियाँ समेट पाता. मुझेमें क्या, किसी भी बाप में इतनी हिम्मत नहीं होती.
मेरे दोनों बड़े बेटों ने पकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था. ज़ीशान को दिल्ली भेज कर मैंने अपनी जागीरों की नक़ल मँगवाने की कोशिश की थी. सुना था सरहद पार जागीर के बदले जागीर मिल रही है. काश इज़्ज़त के बदले इज़्ज़त मिलती. हफ़्ते भर बाद ज़ीशान जागीरों के नक़ल ले कर वापस आ गया. और हम चारों ने 13 अगस्त को हमेशा-हमेशा के लिए पकिस्तान जाने का इरादा कर लिया. हम चरों में मैं, ज़ीशान और मेरी दोनों बेटियाँ. कलेजे पर पत्थर रख कर मैंने दोनों बेटों को यहाँ रहने की इजाज़त दी थी. ये जानता था कि वो भेड़ियों से वो बाख नहीं पायेंगे मगर आख़िरी वक़्त में उस ज़मीन को प्यासा कैसे रखता जिसे मेरी नस्ल-दर-नस्ल अपने ख़ुन से सींचती आई है. जैसे-जैसे 13 अगस्त का दिन नज़दीक आ रहा था वैसे-वैसे बेकली बढ़ती जा रही थी. एक बाप के दिल को भला ऐसे हालत में कैसे चैन मिल सकता है जब उसकी दो बेटियाँ जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखने को तैयार हों और चारों ओर भेड़िये घात लगाए बैठे हों.
11 अगस्त की बात थी, ज़बरदस्त लूट-खसोट और क़त्ल-वो-ग़ारत की ख़बर मिली. 13 साल की बच्ची को उसके भाई-बहनों, माँ-बाप से छीन कर उनके सामने उसकी इज़्ज़त लूटी गयी और उसे क़त्ल कर दिया गया और उसकी माँ को भीड़ अपने साथ ले भागी. मेरा कलेजा मुँह को आ गया. अगर यही कुछ मेरे साथ और मेरी बच्चियों के साथ हुआ तो? मुझे मेरे ख़ानदान के सैकड़ों सालों की क़ुर्बानी का यही सिला देगा मेरा देश? नहीं...मैं अपने बुज़ुर्गों की रूह को शर्मिंदा नहीं करूँगा. ज़ीशान से मैंने मशवरा किया और उसे दो तेज़ धार हथियार लाने को कहा. हमारे बीच ये तय हुआ कि बाप और बेटा अपनी बेटी और बहन का गला उसी तरह रेत डालेंगे जिस तरह कभी हमने जंग में अपनों का गला उतारा था. वफ़ादारी और इज़्ज़त की पास के लिए ये जुर्म हमने करना था क्यूंकि कोई हमारी इज़्ज़त पर हाथ डाले ये हम राजपूतों को गवारा नहीं. तय हुआ कि 13 की बजाय 12 अगस्त को उन्हें क़त्ल कर हम रात के अँधेरे में सरहद पार कर जायेंगे ताकि इन्हें कोई शक न हो.
रात का पुर हौल सन्नाटा पसरा था. ज़ीशान तुम्हारी छोटी फ़ूफ़ी और मैं तुम्हारी बड़ी फ़ूफ़ी के बिस्तर के सिरहाने पहुँच गए मगर दोनों में से किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि उन्हें क़त्ल कर सकें. जंग और जज़्बात यही फ़र्क़ होता है शायद. हम दोनों वापस अपने कमरे में हारे हुए जुआरी की तरह लौटे और उन्हें क़िस्मत के धारे पर छोड़ने का इरादा कर लिया कि अब उनके साथ जो हो वो और ख़ुदा ही समझें मगर राजपूती ख़ून और वफ़ादारी का पास. पल-पल बढ़ता भेड़ियों का वहशीपन. अगली सुबह ख़बर मिली कि पास के गाँव में किसी वहशी ने मुसलमानों के 7 घर फूँक डाले. बस यही वो लम्हा था जब मैं भी वहशी बन गया. 13 अगस्त धीरे-धीरे गुज़र रहा था. वर्षों इंसानियत का पाठ पढ़ाने वाला उस्ताद आज ख़ुद वहशीपने की जाल बुन रहा था, पहले भी जाल बुना था मगर कामयाब नहीं हो पाया. दोनों बड़े बेटों को खालिहान की हिफाज़त के बहाने भेज दिया. अब घर में सिर्फ़ हम चार लोग थे जिन्हें सरहद पार जाना था. काली अंधेरी रात मौत का सन्नाटा लिए धीरे-धीरे उतर रही थी. सबलोग खाना खा कर सोने चले गए. मैंने बेटियों को गले से लगाया और कहा कि आधी रात को चुप-चाप अँधेरे में निकलना है, तबतक तुमलोग थोड़ा लो. सामान पहले ही बंध चूका था. वो सोने गयीं और हम जागने. लगभग घंटे भर बाद ज़ीशान मिटटी के तेल में भीगे कंडे ले आया और साथ में कई गैलन मिटटी का तेल भी. अभी 12 बजने में आधा घंटा रहता था. जब मैंने बेटियों के कमरे को बाहर से बंद किया और मिटटी का तेल उंडेल दिया. चरों तरफ़ मीट्टी तेल से भीगे कंडे ज़ीशान ने रखे और इस बार जज़्बात पर जंग हावी हुआ और मैं चौपाल के पास जानवरों को भगाने के लिए जलाए गए आग में से चन्द शोले उठा लाया और देखते-ही देखते आग की ऊँची लपट उठने लगी. उस आग में मेरा वहशी चेहरा भी आसमान ने देखा होगा. बच्चियों की चीख़ने की आवाज़ पर मैं तड़पा ज़रूर मगर वो तड़प से कम ही थी जो अपनी आँखों ने सामने अपनी बच्चियों के बिखरे वजूद को देख कर होता. जब लपटें आसमान को छूने लगीं हम दोनों पश्चिम की तरफ़ मुँह किये और मन-मन भर के क़दम उठाते लाहौर की तरफ़ चलने को तैयार हुए.
आग की लपटों को देखकर मेरे दोनों बेटे खलिहान से दौड़े-दौड़े आये और हम दोनों को बचाओ-बचाओ की आवाज़ के साथ पुकारने लगे. उन्हें लगा कि किसी दंगाई ने हम सबको आग के हवाले कर दिया है और वो बचाने की ग़र्ज़ से घर के अन्दर जाने की कोशिश करने लगे मगर आग ने उन्हें भी अपने चपेट में ले लिया. ज़ीशान चीख़ना चाहता था मगर वो चीख़ न पाया क्यूँकी मैंने उसका मुँह बहुत ज़ोर से दबा दिया और इस ज़ोर से दबाया कि वो बेहोश हो गया. उसे घसीट कर पास के पेड़ के पीछे किया और इतना रोया कि आँसू सुख गए. सुबह का उजाला फैलने लगा था जब उसे होश आया. 14 अगस्त की सुबह थी. आज़ादी की सुबह. इतनी उदास और ग़मज़दा. ख़ून में नहाई हुई. इसका तो मैंने तसव्वुर भी नहीं किया था. आग अब भी तेज़ थी मगर दिल के अलाव से कम. मैंने अपनी पगड़ी खोली...आँगन से एक मुट्ठी गर्म राख उठाई और बाँध लिया. ये वही राख है और वो जो लाल कपड़ा था न वो तुम्हारी बड़ी फ़ूफ़ी की शादी के लिए ख़रीदा था. जिसे मैंने आँगन में ही दफ़ना दिया...उन्हें कफ़न तो दे नहीं सका. बस याही आख़िरी नज़राना था उन चारों को मेरी तरफ़ से.
माहीन की आँखों से चनाब जारी थी, कुछ भी कहने की हालत में नहीं थी वो. बस अपने दादू को टुकर-टुकर देखे जा रही थी. देख रही थी अपने दादू को जिन्होंने अपनी इज़्ज़त की ख़ातिर कितनी बड़ी क़ुर्बानी दी थी. बहुत देर बाद जब होश में आई तो दादू के सीने से लगकर कहने लगी, ‘वो राख कोई आम राख नहीं मुक़द्दस राख है जिसे सुर्मे की तरह आँखों में लगाया जा सकता है. उन आखों में जिसने आज़ाद मुल्क सपना देखा था मगर किस क़ीमत पर? आज़ादी की क़ीमत होती है क्यूँकी वो क़ुर्बानी मांगती है. और दादू आप वहशी नहीं हो, आपने वो क़ुर्बान किया जो आपका था, आपने आख़िरी वक़्त में भी उस ज़मीन को अपने ख़ून से सींचा. अपने जिगर को किसी और मुल्क में रख कार किस्सी और मुल्क में जीना ही सबसे बड़ी क़ुर्बानी है. आज से ये राख भी मेरे लिए उतनी ही मुक़द्दस है जितनी आपके और पापा के लिए है. सलाम इस अज़ीम क़ुर्बानी को. सरहद पार करने की क़ीमत तो होती है और आपने अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी क़ीमत चुकाई है दादू.
***

 © नैय्यर /14-08-2015

Thursday, 6 August 2015

ज्वालामुखी

उसके रक्तालभ कपोलों से
घुल कर चाँदनी
उसकी मरमरीं जिस्म पर
बिछा जाती है इक गुलाबी चादर
और उसकी आँखों के शफ़्फ़ाफ़ चनाब में
आकाश ऐसे पिघलता है जैसे
सर्दी में ठोप-ठोप टपकता आकाश


मैं असमर्थ हूँ अभी फ़र्क़ करने में
बारिश में भीगी कमल की पत्तियों और
संतरे के नंगी फाँक जैसी उसके होंठों के बीच
मगर मैं अंतर बता सकता हूँ
उसकी ज़ुल्फ़ों के अंधेरों
और बादल की कालिख के बीच का

अपने ज़बान की नोक से
उसके होंठों की चौहद्दी नापते हुए
मैं छू जाता हूँ उसका रक्तालभ कपोल
और भड़क जाती है मुझमें वही पुरानी अगन
जो वक़्त के साथ हो गयी थी
मृत ज्वालामुखी सी

मेरी मरमरीं बुत
दो अलग छोर पर अपनी ऊष्मा
धधकाने से बेहतर है
आ ! मेरी बाहुपाश में
ताकि हम क्षय कर सकें
अपनी अपनी ऊष्मा का
~
- नैय्यर / 04-08-2015

Monday, 3 August 2015

क्या मुस्लिम सिर्फ़ ‘आतंकवादी’ और ‘राष्ट्रद्रोही’ ही रहेगा?

कुछ दिनों पहले फूलन देवी की पुण्यतिथि बीती है. मल्लाह जाति से आने वाली फूलन देवी का सामूहिक बलात्कार उच्च जाति के दबंगों ने किया और उन्होंने प्रतिशोध में हथियार उठा लिया. उनके इस कदम को बुद्धिजीवियों ने ‘क्रांतिकारी’ कदम कहा है क्योंकि यह जातीय संघर्ष के लिए था. उनके इस क्रांतिकारी क़दम ने उन्हें 'बैंडिट क्वीन' बना दिया. अपने यौवन से लेकर उम्र ढ़लने के पड़ाव तक फूलन देवी और उनकी गैंग ने हज़ारों जाने निगल लीं मगर कोई सज़ा नहीं. ढलती उम्र में आत्मसमर्पण कर उन्होंने अपने सारे पाप धो लिए और संसद तक पहुंच गयीं.

भारत का इतिहास दंगों के स्याह रंग से भी पुता हुआ है. बंटवारे और उसके बाद के सैकड़ों दंगों में मुसलमानों को मारा गया. मुस्लिम महिलाओं के साथ हिन्दू चरमपंथियों ने बलात्कार किया. उनके गर्भ चीरकर तलवार की नोक पर अजन्मे बच्चे को लहराया गया. मुस्लिम शिक्षण संस्थानों पर हमले किए गए और मज़ारों मस्जिदों को नेस्तनाबूत कर दिया गया. यहां पर प्रश्न उठना लाज़िम है कि इतना सब होने के बाद यदि कोई मुस्लिम प्रतिशोध में हथियार उठा ले तो वो आतंकवादी क्यों, क्रांतिकारी क्यों नहीं?


यह मानने में कोई गुरेज़ नहीं कि फूलन की तरह याक़ूब की वजह से भी कई जिंदगियां मिट गयीं मगर सज़ा सिर्फ याक़ूब को, क्यों? आत्मसमर्पण तो दोनों ने किए मगर फांसी सिर्फ़ याक़ूब को, क्यों? (सनद रहे कि आडवाणी और प्रवीण तोगड़िया के नाम यहां नहीं लिए जा रहे हैं)

गुजरात में जब मुस्लिमों को चरमपंथियों ने मारा था तो कौन-सा प्रतिशोध हो पाया था? गुजरात में ही घरों में घुसकर जब पुलिस सुरक्षा में हिंदूवादी ताकतों ने मुस्लिम औरतों के साथ बलात्कार किया तब क्या कोई जवाब मुस्लिम समुदाय से उठ पाया था? प्रतिशोध और जवाब सम्बन्धी कोई भी कार्रवाई तब भी नहीं हो पायी थी जब मुस्लिम भीड़ को सामूहिक रूप से जलाया गया था. हाशिमपुरा में तो पीएसी ने घरों से मुस्लिम नौजवानों को खींचकर नहर पर गोली मारी थी. अलीगढ़ से लेकर यवतमाल तक सैकड़ों दंगों में मुस्लिम बर्बाद हुए.

यहां सिर्फ मुस्लिम-मुस्लिम का रोना नहीं है. 1984 के सिख दंगों के बाद भी दमनकारी हिन्दू ताकतों का सिखों ने क्या बिगाड़ लिया? अलबत्ता 21वीं शताब्दी में वे उनके साथ राजनीति करते दिख रहे हैं. ईसाई ननों से बलात्कार, उनकी हत्या और चर्चों पर हमलों के बाद भी ईसाई समाज ने क्या कर लिया? लक्ष्मणपुर बाथे और बथानी टोला में दलितों के नरसंहार पर दलितों ने क्या कर लिया? छिटपुट नक्सली हमलों से अलग, जिसमें वे खुद शामिल नहीं होते हैं, बस्तर के आदिवासियों ने ही कौन-सा पहाड़ तोड़ लिया?

प्रतिशोध में जब सिख हथियार उठाए तो चरमपंथी, आदिवासी उठा ले तो नक्सली, हिन्दू उठा ले तो राष्ट्रवादी, विद्रोही उठा ले तो अलगाववादी लेकिन एक मुस्लिम के प्रतिशोधी स्वरुप को आतंकवादी का नाम दिया जाता है. एक ही काम के इतने अलग नाम क्यों? यहां यह दलील नहीं दी जा रही है कि मुस्लिम को आतंकवादी मत कहो. बल्कि यह समझाने को कोशिश हो रही है कि एक नियम सब पर लागू हो. आतंकवादी उसे ही कहा जाए जो आतंकवादी हो. देशद्रोही उसे ही कहा जाए जो देशद्रोही हो. विरोधी उसे ही कहा जाए जो विरोधी हो. वहां निर्णय एक मानवीय आधार पर लिया जाए, न कि धर्म के आधार पर.

जिस देश की अदालत में फैसले का आधार मनुस्मृति को बनाया जाता हो, उस देश में कोई भी दमित वर्ग क्या कर सकता है? वे लिखने और भाषायी विरोध के अलावा कुछ नहीं कर सकते हैं, लेकिन हिंदूवादी ताकतों का आलम यह है कि वे इस लिखने और विरोध की आवाज़ से ही बिलबिला उठती हैं. क्या कहें इस बिलबिलाहट को, लोकतंत्र या नरसंहार?